सर्वोच्च न्यायालय ने 22 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण निर्णय में गुजरात के सूरत स्थित पैतृक संपत्ति विवाद में दर्ज FIR तथा समस्त आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि सिविल टाइटल विवाद को देर से और बेहतर बनाई गई शिकायतों के माध्यम से आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।

विवाद ग्राम पनास, सूरत स्थित सर्वे नं. 157 की लगभग 5.5 एकड़ पैतृक भूमि से संबंधित था। अपीलार्थियों ने 1988 की ULC Act कार्यवाही के आधार पर ⅔ हिस्से का दावा किया, जबकि प्रतिवादी ने 1987 के समझौता डिक्री पर आधारित एकल स्वामित्व का दावा किया। वर्ष 2000 से सिविल मुकदमेबाजी चल रही थी जिसमें अपीलार्थियों के पक्ष में स्थायी निषेधाज्ञा भी दी जा चुकी थी।

मई 2009 में — घटना के लगभग 8 वर्ष बाद — प्रतिवादी ने एक ऐसी शिकायत दर्ज कराई जिसमें उगाही या धनराशि की मांग का कोई आरोप नहीं था। किंतु 7 माह बाद 31 दिसंबर 2009 को नई FIR में पहली बार ₹1.5 करोड़ की मांग और धमकी के आरोप जोड़े गए। गुजरात उच्च न्यायालय ने नवंबर 2023 में FIR रद्द करने से इनकार कर दिया, जिससे यह अपील सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई।

अपीलार्थियों के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नचिकेत जोशी ने तर्क दिया कि वर्षों की सिविल लिटिगेशन में प्रतिवादी ने कभी भी जालसाजी, उगाही या षड्यंत्र का आरोप नहीं लगाया। पहली शिकायत में उगाही का उल्लेख तक नहीं था। विवादित संपत्ति पर Power of Attorney निष्पादित करना IPC की धारा 464 के अर्थ में "कूटरचना" नहीं है। प्रतिवादी के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री धवल डी. व्यास ने कहा कि मामले में जालसाजी, ठगी और उगाही के गंभीर आपराधिक अपराध शामिल हैं और उच्च न्यायालय ने जांच सामग्री की विस्तृत समीक्षा के बाद उचित आदेश पारित किया है।

न्यायालय ने मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य [(2009) 8 SCC 751] का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अपनी संपत्ति होने का दावा करते हुए दस्तावेज़ निष्पादित करना — भले ही दावा बाद में असफल हो — कूटरचना नहीं होती। मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [(2023) 20 SCC 219] के आधार पर न्यायालय ने कहा कि असाधारण और अस्पष्टीकृत विलंब के साथ शिकायत में किए गए भौतिक सुधार, अभियोजन की वास्तविकता पर गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं। हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल [AIR 1992 SC 604] के अंतर्गत उन श्रेणियों का हवाला देते हुए FIR रद्द करने का आदेश दिया जिनमें सिविल विवाद को आपराधिक रंग दिया गया हो, अपराध के आवश्यक तत्व अनुपस्थित हों, और कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हो।

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय का 7 नवंबर 2023 का आदेश निरस्त करते हुए FIR नं. I-CR No. 504/2009 तथा उससे उत्पन्न समस्त आपराधिक कार्यवाही सहित चार्जशीट को भी अपीलार्थियों के संदर्भ में रद्द कर दिया। स्पष्ट किया कि यह निर्णय लंबित सिविल कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेगा।

Case Details:

Case no.: Criminal Appeal Nos. of 2026 (arising from SLP (Crl.) Nos. 15537 & 16049 of 2023)

Bench: Justice Sanjay Karol & Justice Vipul M. Pancholi

Appellants: Bhikhubhai Govindbhai Patel & Anr.

Respondents: The State of Gujarat & Anr.

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