सर्वोच्च न्यायालय ने 7 मई 2026 को एक ऐतिहासिक निर्णय में धारा 498A IPC के अंतर्गत एक पति की सजा को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि मात्र 13 दिनों तक टेलीफोन पर बातचीत न करना, बिना किसी ठोस साक्ष्य के, "क्रूरता" की परिभाषा में नहीं आता।
प्रकरण में संगीता नामक महिला ने 31 जनवरी 2015 को अपने माता-पिता के घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसका विवाह अपीलार्थी जयेश कन्ना से 2 नवंबर 2014 को हुआ था। अपीलार्थी मस्कट, ओमान में इंजीनियर था और 29 नवंबर 2014 को भारत छोड़ चुका था। अभियोजन का आरोप था कि अपीलार्थी ने फोन पर बात करने से इनकार कर मृतका को मानसिक यातना दी, जिससे उसे आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा।
ट्रायल कोर्ट ने सभी सह-अभियुक्तों को बरी कर दिया तथा अपीलार्थी को धारा 304B में भी दोषमुक्त किया, किंतु धारा 498A के अंतर्गत दोषी मानते हुए 3 वर्ष के सश्रम कारावास एवं ₹10,000 जुर्माने की सजा दी। मद्रास उच्च न्यायालय ने इस दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसके विरुद्ध यह अपील की गई।
अपीलार्थी के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आर. बसंत ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए और केवल मौखिक साक्ष्य पर आधारित आरोप पर्याप्त नहीं है। अपीलार्थी ने स्वयं कहा कि उसने संपर्क का प्रयास किया, परंतु मृतका का मोबाइल खराब था। प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि यह जानबूझकर किया गया मानसिक उत्पीड़न था।
न्यायालय ने मोहम्मद होशन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य [(2002) 7 SCC 414] तथा मंजू राम कलिता बनाम असम राज्य [(2009) 13 SCC 330] पर भरोसा करते हुए दोहराया कि मानसिक क्रूरता प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर निर्धारित होती है। इसे लगातार एवं निरंतर होना चाहिए; सामान्य वैवाहिक मतभेद धारा 498A की परिधि में नहीं आते।
सर्वोच्च न्यायालय ने अभियोजन को धारा 498A IPC के तत्वों को सिद्ध करने में पूर्णतः विफल पाया और अपीलार्थी की दोषसिद्धि एवं सजा को निरस्त कर दिया। जमानत बांड भी मुक्त किए गए तथा पासपोर्ट वापस करने का निर्देश दिया गया।
Case Details:
Case no.: Criminal Appeal Nos. 2382–2383 of 2026
Petitioner: Jayesh Kanna
Respondent: The Assistant Commissioner Law and Order (West) & Ors.
Bench: Justice J.K. Maheshwari & Justice Atul S. Chandurkar
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