मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने 4 मई, 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए उन भूस्वामियों द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार की, जिनकी राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण हेतु अर्जित भूमि का अधिनिर्णीत मुआवज़ा राज्य प्रशासन द्वारा रोक लिया गया था। न्यायालय ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से अधिमानतः आठ सप्ताह के भीतर रु. 3,35,40,000/- की राशि याचिकाकर्ताओं को अदा करें।
याचिकाकर्ता जिला शहडोल के सोहागपुर स्थित खसरा क्रमांक 136/5/1/1 एवं 136/5/2/1 की भूमि के वैध स्वामी हैं। यह भूमि प्रारंभ में उमरिया से शहडोल जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण हेतु की गई सामूहिक अधिग्रहण प्रक्रिया में शामिल नहीं थी। बाद में यह पाया गया कि उक्त भूमि परियोजना के लिए आवश्यक है, अतः इसे "मिसिंग प्लॉट" के रूप में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के 15.03.2016 के परिपत्र के अंतर्गत पारस्परिक सहमति नीति के तहत अर्जित किया गया। सक्षम प्राधिकारी ने रु. 3,35,40,000/- का मुआवज़ा निर्धारित किया। भुगतान प्रस्ताव 02.01.2026 को उच्च प्राधिकारियों को भेजा गया। 05.01.2023 एवं 11.04.2026 को दिए गए अभ्यावेदनों के बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर याचिकाकर्ताओं को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भूमि अर्जित होने और मुआवज़ा निर्धारित हो जाने के बाद प्रतिवादी राशि जारी करने के लिए कानूनी बाध्यता में हैं। संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत अर्जित भूमि का मुआवज़ा प्राप्त करना संपत्ति के अधिकार का अभिन्न अंग है और इसे रोकना विधि के बिना संपत्ति से वंचित करना है।
प्रतिवादी (राज्य) ने स्वीकार किया कि मुआवज़ा निर्धारित हो चुका है और प्रस्ताव भेजा जा चुका है, किंतु विलंब का कारण प्रशासनिक औपचारिकताएं बताई गईं और कहा गया कि विलंब जानबूझकर नहीं है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की खंडपीठ ने तीखी और संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
- भूमि अर्जित होने और मुआवज़ा निर्धारित होने के पश्चात राज्य का त्वरित भुगतान करना परम कर्तव्य है; विलंब से वैधानिक योजना का उद्देश्य विफल होता है और भूस्वामियों को घोर क्षति होती है।
- मुआवज़े का अधिकार केवल वैधानिक हक़ नहीं, बल्कि अनुच्छेद 300-A के अंतर्गत संवैधानिक गारंटी है; इसे रोकना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
- पारस्परिक सहमति से अधिग्रहण नीति का स्वयं का उद्देश्य विफल हो जाता है यदि सहमति देने वाले भूस्वामियों को अनिश्चित काल तक प्रतीक्षा करनी पड़े।
- प्रशासनिक अकुशलता एवं प्रक्रियागत विलंब याचिकाकर्ताओं के संवैधानिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकते।
- जब राज्य ने स्वयं मुआवज़ा निर्धारित कर भुगतान प्रस्ताव भेज दिया, तो राशि रोकने का कोई औचित्य शेष नहीं रहता।
न्यायालय ने अपने तर्क को भारत के संविधान के अनुच्छेद 300-ए (संवैधानिक अधिकार के रूप में संपत्ति का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (मनमानी राज्य कार्रवाई के विरुद्ध अधिकार) पर दृढ़ता से आधारित किया है, जो इस सुस्थापित सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि समय पर मुआवजे के बिना भूमि अधिग्रहण संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
Case Details
Case No.:Writ Petition No. 15538 of 2026
Bench: Justice Anand Pathak & Justice B.P. Sharma
Petitioner: Smt. Shanti Singh and Others
Respondent: State of Madhya Pradesh and Others
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