सर्वोच्च न्यायालय ने 8 मई, 2026 को एक ऐतिहासिक एवं व्यापक निर्णय में अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया और विचारण न्यायालय का सीपीसी के आदेश VII नियम 11 के अंतर्गत वाद-पत्र अस्वीकृति का आदेश बहाल कर दिया। न्यायालय ने संपत्ति को बेनामी घोषित करते हुए केंद्र सरकार को आठ सप्ताह के भीतर प्रशासक नियुक्त कर संपत्ति अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया।
प्रतिवादी/वादी (डी.ए. श्रीनिवास) ने बेंगलुरु ग्रामीण जिले के मुख्य वरिष्ठ दीवानी न्यायाधीश के समक्ष एक दीवानी वाद दायर कर 20.04.2018 को मृतक के. रघुनाथ द्वारा कथित रूप से निष्पादित वसीयत के आधार पर कृषि भूमि पर स्वामित्व का दावा किया। वादी ने कहा कि उसने एमओयू के माध्यम से के. रघुनाथ के नाम से भूमि क्रय का वित्तपोषण किया था और रघुनाथ उसके लाभ के लिए संपत्ति धारण कर रहे थे। अपीलकर्ता — के. रघुनाथ की पत्नी व बच्चे — ने तर्क दिया कि संपत्ति मृतक की स्वअर्जित थी और वादी पर हत्या का आरोप है जिसकी सीबीआई जांच चल रही है। विचारण न्यायालय ने वाद-पत्र अस्वीकार किया; कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उसे पलट दिया; अतः यह अपील।
अपीलकर्ताओं ने कहा कि वाद-पत्र के अर्थपूर्ण पाठन से स्पष्ट है कि वादी ने स्वयं धन दिया और मृतक नाम-उधारकर्ता था — यह बेनामी लेन-देन है। एमओयू कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम की धाराओं को हराने के लिए बने थे। नियोक्ता-कर्मचारी संबंध "न्यासिक क्षमता" नहीं है। वादी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के अंतर्गत अयोग्य है।
वादी ने कहा कि वाद केवल वसीयत पर आधारित है, न्यासिक संबंध था, सभी विवादित प्रश्नों के लिए विचारण आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कई महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर निम्नलिखित व्यापक टिप्पणियां दीं:
- वाद-पत्र का अर्थपूर्ण, न केवल औपचारिक पाठन आवश्यक है; चतुर प्रारूपण से उत्पन्न वाद-हेतु का आभास "प्रारंभ में ही समाप्त" किया जाना चाहिए।
- नियोक्ता-कर्मचारी संबंध बेनामी अधिनियम के अंतर्गत न्यासिक संबंध नहीं है। वाणिज्यिक व्यवस्थाएं न्यासिता नहीं बनतीं।
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 का प्रतिबंध उत्तरदायित्व एवं वसीयती उत्तराधिकार दोनों पर लागू होता है; दोषसिद्धि अनिवार्य नहीं।
- 2016 संशोधन पूर्वव्यापी है — घोषणात्मक, उपचारात्मक और प्रक्रियागत प्रावधान पूर्व के बेनामी लेन-देनों पर भी लागू होते हैं।
- जब्ती दीवानी परिणाम है, अभियोजन नहीं — दोनों एक साथ चल सकते हैं; अनुच्छेद 20(2) आकृष्ट नहीं होता।
- एक बार न्यायिक घोषणा हो जाने के बाद केंद्र सरकार सीधे संपत्ति जब्त कर सकती है; निर्णायक प्राधिकरण की प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं।
Case Details
Case No.: Civil Appeal No. 7370 of 2026 (arising out of SLP (C) No. 7924 of 2024)
Bench: Justice J.B. Pardiwala & Justice R. Mahadevan
Appellants: Manjula and Others
Respondent: D.A. Srinivas
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