जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में यह हमेशा देखा गया है कि अदालतें इसे वरीयता देती हैं। ऐसे ही एक मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार की मेडिकल रिइम्बर्समेंट नीति यानि खर्चों की भरपाई वाली नीति, की समीक्षा की जरूरत पर जोर देते हुए कहा है कि जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में भुगतान, केवल तकनीकी आधार पर दावों को खारिज नहीं किया जा सकता।
जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार,संविधान के अनुच्छेद 21 के तहतप्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी या पेंशनर को आपातकालीन स्थिति में इलाज की आवश्यकता हो और वह उस वक्त हालत की गंभीरता की वजह से किसी गैर-पैनल अस्पताल में भर्ती होता है। तो ऐसे में उसके दावे को केवल नियमों के आधार पर नकारना अनुच्छेद 21 के खिलाफ होगा।
हाईकोर्ट में याचिका और अदालत की टिप्पणी
- उच्च न्यायालय सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों द्वारा राज्य की चिकित्सा से जुड़े खर्चे को लेकर रिइंबर्समेंट यानि खर्चों की भरपाई वाली नीति के विभिन्न पहलुओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।
- अदालत ने साफ किया कि गंभीर बीमारी या आपातकालीन परिस्थितियों में कर्मचारी और पेंशनर अक्सर उपलब्ध निकटतम अस्पताल में इलाज कराने को मजबूर होते हैं।
- सिर्फ इस आधार पर कि अस्पताल सरकार के पैनल में नहीं था, चिकित्सा खर्च का भुगतान रोकना मानव जीवन से अधिक प्रक्रिया को महत्व देने जैसा होगा।
- अदालत ने कहा कि हाल के चिकित्सा खर्चों को देखते हुए पुराने प्रावधानों पर फिर से विचार करना होगा, जिससे कि वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नियम बन सके।
अदालत ने इस मामले में, यह भी साफ किया कि जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी या पेंशनर को आपातकालीन स्थिति में इलाज की आवश्यकता हो और वह उस वक्त हालत की गंभीरता की वजह से किसी गैर-पैनल अस्पताल में भर्ती होता है। तो ऐसे में उसके दावे को केवल नियमों के आधार पर नकारना अनुच्छेद 21 के खिलाफ होगा।
हाईकोर्ट के फैसले में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का सिद्धांत का चयन
न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने अपने आदेश में प्राचीन संस्कृत श्लोक ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ का उल्लेख करते हुए कहा कि शासन का मूल उद्देश्य ही नागरिकों के स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा करना है। हाईकोर्ट मामले पर कहा कि यह केवल धार्मिक या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कल्याणकारी राज्य की संवैधानिक अवधारणा का भी आधार है। राज्य की नीतियों का मूल्यांकन इसी दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए कि वे नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा दें, न कि उन्हें अनावश्यक छोटी मोटी अड़चनें खड़ी कर बाधाओं में उलझाएं।
कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को चिकित्सा से मामलों में राहत
सबसे बड़ी बात कि इस मामले में हरियाणा सरकार ने भी अपनी ओर से यह स्वीकार किया इसकी जरूरत है। सरकार ने हाईकोर्ट को बताया गया कि मेडिकल रिइम्बर्समेंट नीति के अलग अलग प्रावधानों की समीक्षा पहले से जारी है। सरकार ने यह भी कहा कि कर्मचारियों और पेंशनरों की ऐसी शिकायतों तथा दावों पर फिर से विचार किया जाएगा।कहा जा सकता है कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामले में यह साफ कहा गया है कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति का उद्देश्य केवल बिलों का भुगतान करना नहीं, बल्कि कर्मचारियों और पेंशनरों को आर्थिक संकट से बचाना भी है।
Picture Source : https://www.flickr.com/photos/worldbank/14486015000/