सुप्रीम कोर्ट ने नवी मुंबई के वाशी स्थित एक बहुचर्चित भूमि आवंटन विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि हर अवैध या अनियमित भूमि आवंटन का समाधान ध्वस्तीकरण नहीं हो सकता। अदालत ने नवी मुंबई के वाशी इलाके में 17 वर्षों से चल रहे शॉपिंग मॉल और होटल को गिराने पर रोक लगा दी है। इस फैसले से कई वाजिब सवाल पैदा हुए हैं, मसलन क्या अवैध भूमि आवंटन पर ध्वस्तीकरण का हाइकोर्ट का आदेश सही नहीं था...क्या सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आगे के ऐसे मामलों में मिसाल बनेगा?
क्या था वाशी इलाके के शॉपिंग माल होटल का विवाद और पृष्ठभूमि
मामला रहेजा ग्रुप को नवी मुंबई के वाशी सेक्टर-30A में CIDCO यानि City And Industrial Development Corporation Of Maharashtra Ltd के द्वारा साल 2003 में, एक भूखंड आवंटित किए जाने से जुड़ा था। बाद में इस आवंटन को गलत और प्रक्रियागत खामियों से युक्त माना गया। विवाद जब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने 2014 में इस आवंटन को अवैध बताया। और भूमि को मूल स्थिति में बहाल करने तथा CIDCO को वापस सौंपने का आदेश दिया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट के ध्वस्तीकरण आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने किन आधारों पर पलटा?
- सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की बेंच ने इसे सुना और कहा कि अदालत को केवल मूल अनियमितता ही नहीं बल्कि वर्तमान परिस्थितियों को भी देखना चाहिए।
- शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में जनहित से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है। साथ ही आर्थिक वास्तविकताओं और सामाजिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है।
- सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों को सुनने के बाद साफ किया कि यहां निर्मित मॉल और होटल पिछले 17 वर्षों से चल रहे हैं। ऐसे में इनको गिरा कर ध्वस्त किए जाने से बड़े पैमाने पर सामाजिक तथा आर्थिक नुकसान होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने जनहित और वैधानिकता के बीच संतुलन कैसे बनाया?
पूरे विवाद और साक्ष्यों औऱ दलीलों को सुनने के बाद हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि भूमि आवंटन में गंभीर अनियमितताएं थीं। अदालत ने इस आधार पर कहा कि ऐसे मामले में डेवलपर को इसका आर्थिक लाभ भी नहीं मिलने दिया जा सकता। इसलिए अदालत ने नियमितीकरण का रास्ता अपनाते हुए रहेजा को 2014 की रेडी रेकनर दरों के आधार पर लगभग ₹318.31 करोड़ का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त कंपनी को ₹1 करोड़ की अतिरिक्त राशि भी जमा करने के लिए कहा। अदालत ने साफ किया कि निर्धारित राशि चार माह के भीतर जमा होने पर भूमि आवंटन नियमित माना जाएगा।
क्या यह फैसला भविष्य के भूमि आवंटन विवादों के लिए नई मिसाल बनेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने जैसा फैैसला दिया, अभूतपूर्व है। पहले कई मामलों में देखने में आया था कि सुप्रीम कोर्ट अवैध भू-आवंटन या अवैध निर्माण पर काफी सख्त रहा है। ऐसे में शीर्ष अदालत का यह फैसला सार्वजनिक भूमि आवंटन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के जरिए साफ किया कि अवैधता को हमेशा वैध ही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि समय के साथ किसी परियोजना से व्यापक आर्थिक और सामाजिक हित जुड़ गए हों तो अदालतें केवल कठोर दंड देने का ही नजरिया नही रखेंगी।
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