इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने पहली पत्नी के गुजारे भत्ते यानी मेंटेनेंस की रकम 1000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये प्रति माह करने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है। जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने 11 मई के अपने आदेश में कहा था कि बढ़ती महंगाई के बीच किसी भी महिला के लिए इतनी मामूली रकम में अपना खर्च चलाना पूरी तरह से असंभव है।
क्या है पूरा मामला?
अदालत के दस्तावेजों के मुताबिक, इस जोड़े की शादी साल 1995 में हुई थी। पति का आरोप है कि उसकी पत्नी पिछले 17 सालों से बिना किसी ठोस वजह के उससे अलग रह रही है। पति ने कोर्ट में दावा किया कि उसकी पत्नी अपना खुद का बिजनेस चलाती है और उससे हर महीने करीब 30,000 रुपये कमाती है। उसने यह भी कहा कि उसे दहेज उत्पीड़न के एक मामले में बरी किया जा चुका है और पत्नी व बच्चों का खर्च उठाने की वजह से उसकी खुद की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।
पति ने अदालत को बताया कि साल 2003 में कोर्ट ने पत्नी और दो नाबालिग बच्चों के लिए कुल 1,600 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता तय किया था और वह यह रकम लगातार दे रहा था। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने गलत तरीके से पत्नी का मेंटेनेंस बढ़ाकर 5000 रुपये कर दिया।
पत्नी की दलील- 'पति ने की दूसरी शादी'
पति की याचिका का विरोध करते हुए पत्नी ने अदालत को बताया कि उसके पति ने उसे धोखा दिया और दूसरी शादी कर ली, साथ ही उसका खर्च उठाने से भी इनकार कर दिया। महिला ने बताया कि बढ़ती महंगाई और जीवन यापन के बढ़ते खर्चों की वजह से उसने करीब 11 साल बाद (28 मार्च 2024 को) गुजारा भत्ता बढ़ाने की अर्जी दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अचल सचदेव ने फैमिली कोर्ट के फैसले का आकलन किया। हाईकोर्ट ने गौर किया कि इस दंपती के दोनों बच्चे अब बालिग हो चुके हैं, इसलिए अब वे गुजारा भत्ता पाने के हकदार नहीं हैं। अदालत ने कहा, "इन 11 सालों में निस्संदेह महंगाई काफी बढ़ गई है। यहां तक कि एक मजदूर की दिहाड़ी में भी काफी इजाफा हुआ है। महंगाई के ऐसे दौर में सिर्फ एक हजार रुपये में किसी महिला का गुजारा करना असंभव है।"
पति की जिम्मेदारी है कि वो पहली पत्नी का खर्च उठाए
अदालत ने सबूतों और पति द्वारा जमा किए गए आय प्रमाण पत्र (इनकम सर्टिफिकेट) की फोटोकॉपी के आधार पर पाया कि पति एक मजदूर के तौर पर काम करता है और वह बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने में पूरी तरह से सक्षम है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह शख्स की पहली पत्नी है, इसलिए यह उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करे, खासकर तब जब पुरानी रकम महंगाई के हिसाब से नाकाफी हो चुकी हो। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 1000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता करने के आदेश को बिल्कुल सही और न्यायसंगत ठहराया और इसमें दखल देने से इनकार कर दिया।
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