इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निर्णय में कहा है कि भरण-पोषण की कार्यवाही में कोई पत्नी जानबूझकर अपनी वास्तविक आय छिपाती है, तो उसके गुजारा भत्ता के दावों का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए उस पत्नी को दिए जा रहे मासिक भरण-पोषण को रद्द कर दिया, जिसने ट्रायल कोर्ट के समक्ष अपनी आय शून्य बताई थी, जबकि हाईकोर्ट में एक अलग याचिका में उसने अपनी वार्षिक आय साढ़े चार लाख रुपये से अधिक घोषित की थी। कोर्ट ने नाबालिग बेटे के भरण-पोषण को बरकरार रखा लेकिन पत्नी के दावे को सही वित्तीय खुलासे के आधार पर नए सिरे से तय करने के लिए वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने दिया है।

उधर, पत्नी ने भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग करते हुए पुनरीक्षण याचिका की। पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर भरण-पोषण का आदेश प्राप्त किया है। यह बताया गया कि फैमिली कोर्ट के समक्ष संपत्ति और देनदारियों के खुलासे के हलफनामे में पत्नी ने अपनी आय शून्य घोषित की थी। उसी अवधि के दौरान उसने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में दिए हलफनामे में नेटवर्थ प्रमाणपत्र और आयकर रिटर्न संलग्न किया था। वर्ष 2022-23 के आयकर रिटर्न में लगभग 4,58,570 रुपये (तथा चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाणपत्र के अनुसार 4,81,310 रुपये) की वार्षिक आय थी। जबकि रेस्तरां चलाने वाले पति ने प्रतिमाह केवल 30,000 रुपये की आय का दावा किया और बेटे को भरण-पोषण का भुगतान करने की इच्छा व्यक्त की लेकिन पत्नी को दी गई राशि पर आपत्ति जताई।

धारा 307 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी

इसके विपरीत पत्नी के वकील ने किसी भी तथ्य को छिपाने से इनकार किया। तर्क दिया कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वह अपने पिता द्वारा की गई फिक्स्ड डिपॉजिट के मामूली ब्याज पर निर्भर है, जो खुद व अपने बेटे को पालने के लिए अपर्याप्त है। पत्नी ने अपने साथ हुई क्रूरता उजागर करते हुए बताया कि उसके पिता ने पति और उसके परिवार के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। उसने अपने बेटे की चिकित्सा, शैक्षिक और आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग की।

दस्तावेजी साक्ष्यों को पूरी तरह नजरअंदाज किया

कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पत्नी के विरोधाभासी आय बयानों के संबंध में पति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी साक्ष्यों को पूरी तरह नजरअंदाज किया। तथ्यों को छिपाने पर सख्त रुख अपनाते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि कोई पक्ष महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है या झूठी जानकारी देता है तो अदालतें अदालतें उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती हैं और इस आचरण के लिए अवमानना की कार्यवाही या झूठी गवाही मुकदमा चलाया जा सकता है।

बेसहारा होने और दर-दर भटकने से रोकना

कोर्ट ने भरण-पोषण कानूनों के मूल उद्देश्य का हवाला देते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सामाजिक न्याय का एक उपाय है जिसका उद्देश्य बेसहारा होने और दर-दर भटकने से रोकना है। यह प्रावधान दंडात्मक नहीं बल्कि सुधारात्मक है, जो यह सुनिश्चित करता है कि अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ पत्नी, बच्चे या माता-पिता को घोर गरीबी में न छोड़ दिया जाए। यह भी कहा कि स्वतंत्र आय होने मात्र से कोई पत्नी वित्तीय सहायता प्राप्त करने के अयोग्य नहीं हो जाती। महज कुछ आय होना अपने आप किसी पत्नी को भरण-पोषण का दावा करने से अयोग्य नहीं बनाता, यदि वह आय विवाह के दौरान प्राप्त जीवन स्तर के अनुसार खुद को और अपने नाबालिग बच्चे को पालने के लिए अपर्याप्त है।

पति की पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पति के शुद्ध मासिक वेतन का 25 प्रतिशत जीवनसाथी के भरण-पोषण के लिए एक व्यापक मानदंड है लेकिन यह कोई अनिवार्य फॉर्मूला नहीं है। कोर्ट ने विरोधाभासी आय खुलासों का मिलान करने में फैमिली कोर्ट को विफल पाते हुए पति की पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। साथ ही पत्नी को दिए गए आठ हजार रुपये के मासिक भरण-पोषण को रद्द कर दिया और आय, संपत्ति व देनदारियों का ठीक से मूल्यांकन करने के बाद उसकी पात्रता के नए सिरे से निर्धारण के लिए मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया।

कोर्ट ने नाबालिग बेटे को पांच हजार रुपये के मासिक भरण-पोषण को बरकरार रखा और पति को इस राशि का भुगतान जारी रखने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को तीन महीने के भीतर एक तर्कसंगत और व्यापक आदेश करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें पत्नी की भरण-पोषण बढ़ाने की याचिका पर भी विचार किया जाएगा।

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