बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी उधार लेने वाले व्यक्ति से अपने पैसे वापस मांगना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने एक स्कूल टीचर की आत्महत्या के मामले में छह आरोपियों को राहत दी है।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306, जो आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित है, उसके तहत मामला बनाने के लिए यह एक जानबूझकर किया गया काम होना चाहिए, जो किसी व्यक्ति को अपनी जान लेने के लिए उकसाए।
दरअसल, अमित मोरे जो कि पैसे उधार देने का काम करते है। उनपर और पांच अन्य लोगों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा था। यह मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र के कोल्हापुर में दिलीप मांडे ने लोन रिकवरी एजेंटों द्वारा कथित तौर पर परेशान किए जाने के बाद अपनी जान दे दी।
उनके खिलाफ दायर चार्जशीट को रद करते हुए, कोर्ट ने साफ किया कि अपने ही पैसे वापस मांगना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।
लोन वापस मांगना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: HC
जस्टिस रंजीत सिंह राजा भोंसले की बेंच ने कहा, "लोन की वापसी या भुगतान के लिए उधार देने वाले द्वारा पैसे मांगना या बार-बार याद दिलाना, किसी भी तरह से आत्महत्या के लिए उकसाने का काम नहीं माना जा सकता।" बेंच ने यह भी कहा कि ऐसा कोई जानबूझकर उकसाना या कोई साजिश नहीं थी, जिसके कारण उस व्यक्ति ने आत्महत्या की हो।
कोर्ट ने आगे कहा, "IPC की धारा 306 के तहत मामला बनाने के लिए जिस जरूरी इरादे की जरूरत होती है यानी किसी को आत्महत्या करने के लिए उकसाने का इरादा रखना।
वह FIR में लगाए गए आरोपों से जाहिर नहीं होता है।" मांडे, जो पेशे से एक टीचर थे, उन्होंने इस मामले में नामजद उधार देने वालों से पैसे उधार लिए थे। 2022 में, उनके परिवार ने शिकायत दर्ज कराई कि उधार देने वाले उन्हें लगातार परेशान कर रहे थे।
इस परेशानी के चलते, उन्होंने कथित तौर पर जहर खा लिया और उनकी मौत हो गई। उनके परिवार की शिकायत के आधार पर, कोल्हापुर पुलिस ने मोरे और पांच अन्य लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया था। कोर्ट के आदेश के बाद उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद कर दी गई है।
Picture Source :