उत्तर प्रदेश के अमेठी में शिक्षा विभाग के बहुचर्चित करीब चार करोड़ रुपये के कथित गबन मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एफआईआर की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का निर्देश दिया है। साथ ही जिलाधिकारी अमेठी द्वारा जारी वसूली आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी गई है। न्यायालय ने इस मामले को गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर बल दिया है।

मामला श्रवण कुमार द्विवेदी द्वारा दाखिल रिट याचिका संख्या 4920/2026 से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने 2 अप्रैल 2026 को जारी वसूली आदेश को चुनौती देते हुए न्यायालय से उसे निरस्त करने की मांग की थी। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने यह भी अनुरोध किया था कि उक्त आदेश के आधार पर उसके खिलाफ कोई दंडात्मक या कठोर कार्रवाई न की जाए।

कर्मचारियों की मिलीभगत से घोटाले को दिया गया था अंजाम 

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताओं ने न्यायालय को बताया कि बेसिक शिक्षा विभाग अमेठी के वित्त एवं लेखा कार्यालय तथा कोषागार कार्यालय के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से धनराशि उसके खाते में स्थानांतरित की गई थी। बाद में जब इस धनराशि की जानकारी हुई तो उसने विभाग को इसकी सूचना दी। इसके बाद विभाग से जुड़े एक व्यक्ति के कहने पर अधिकांश राशि उसके खाते में वापस स्थानांतरित कर दी गई तथा कुछ राशि नकद लौटा दी गई।

सरकार ने गबन में संलिप्तता का लगाया आरोप

राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों की ओर से न्यायालय को बताया गया कि सरकारी धन के गबन के मामले में जांच के दौरान याचिकाकर्ता की संलिप्तता सामने आई है। जांच में यह भी पाया गया कि सरकारी धन उसके खाते में स्थानांतरित हुआ था। इसी आधार पर जिलाधिकारी द्वारा भू-राजस्व के रूप में धनराशि की वसूली का आदेश जारी किया गया था। हालांकि सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष न्यायालय को यह स्पष्ट नहीं कर सका कि किस वैधानिक प्रावधान के अंतर्गत जिलाधिकारी ने वसूली आदेश जारी किया था। इसी बिंदु पर न्यायालय ने गंभीर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि जब किसी मामले में गबन या धोखाधड़ी से संबंधित आपराधिक मुकदमा दर्ज हो चुका हो, तब कथित गबन की राशि को भू-राजस्व के रूप में वसूल नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में धनराशि की वसूली कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही की जा सकती है। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के मामलों में क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट, प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) अथवा अन्य प्रासंगिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन भू-राजस्व की तरह वसूली करना प्रथम दृष्टया उचित प्रतीत नहीं होता।

चार करोड़ रुपये के लेन-देन पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि लगभग चार करोड़ रुपये की सरकारी धनराशि कोषागार से विभिन्न खातों में स्थानांतरित की गई थी। न्यायालय ने टिप्पणी की कि यह अपराध करने का एक नया तरीका प्रतीत होता है और ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसी प्रकार की घटनाएं प्रदेश के अन्य जिलों में भी हुई हों। न्यायालय ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और गहन जांच को आवश्यक बताते हुए कहा कि मामले की तह तक पहुंचना बेहद जरूरी है ताकि वास्तविक दोषियों की पहचान हो सके।

जिलाधिकारी से मांगा व्यक्तिगत शपथपत्र

हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी अमेठी को निर्देश दिया है कि वह अगली सुनवाई से पहले व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करें। शपथपत्र में उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने किस कानूनी अधिकार और प्रावधान के तहत उस धनराशि की वसूली का आदेश जारी किया जो पहले से ही आपराधिक जांच का विषय बनी हुई है।

सीबीआई को सौंपी गई जांच, अगली सुनवाई 10 अगस्त को

न्यायालय ने थाना गौरीगंज में दर्ज एफआईआर संख्या 97/2025 की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया है। सीबीआई के संयुक्त निदेशक, लखनऊ को मामले की जांच अपने हाथ में लेकर एक सक्षम टीम गठित करने तथा अगली तिथि तक स्थिति रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

इसके साथ ही पुलिस अधीक्षक अमेठी को पूरी केस डायरी और संबंधित दस्तावेज तत्काल सीबीआई को उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है। न्यायालय ने अगली सुनवाई के लिए 10 अगस्त 2026 की तिथि निर्धारित करते हुए तब तक विवादित वसूली आदेश पर रोक बरकरार रखने का निर्देश दिया है।

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