सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए कहा है कि कोई भी सरकार या विभाग अस्थायी कर्मचारियों से स्थायी कर्मियों की तरह काम लेकर उन्हें उनके हक और पेंशन से वंचित नहीं रख सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समान काम के बदले अधिकार छीनना नाइंसाफी है। राज्य एक 'आदर्श नियोक्ता' है और वह प्रशासनिक ढिलाई के चलते दशकों तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को अधर में नहीं छोड़ सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें डाक विभाग में दशकों तक नाइट गार्ड के रूप में सेवाएं देने वाले अस्थायी कर्मचारियों को पेंशन लाभ देने से इन्कार कर दिया गया था।
पेंशन खैरात नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 के एक ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन कोई खैरात या इनाम नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी की वर्षों की कड़ी मेहनत की कमाई है।
संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत यह संपत्ति के समान एक 'संवैधानिक अधिकार' है। विभाग की सुस्ती या प्रशासनिक विफलता के कारण किसी भी कर्मचारी के इस मौलिक और कानूनी अधिकार को छीना या निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। तीन महीने में भुगतान करने का सख्त निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने डाक विभाग की 1991 की योजना का जिक्र करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ही अस्थायी श्रमिकों को धीरे-धीरे नियमित ग्रुप 'डी' कर्मचारियों के समकक्ष लाना था।
इन कर्मचारियों को महंगाई भत्ता और मकान किराया भत्ता दिया जा रहा था, जो साबित करता है कि उनका काम स्थायी प्रकृति का था। कोर्ट ने कहा, "संविधान के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 38, 39 और 43) राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय और श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन देने की जिम्मेदारी सौंपते हैं।"
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि वह इन पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों की पेंशन और सेवानिवृत्ति के अन्य लाभों की गणना करे और तीन महीने के भीतर इसका भुगतान करे। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि तय समय में भुगतान नहीं किया गया, तो विभाग को बकाया राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज देना होगा।
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