उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता की गर्भ समाप्ति (MTP) की अनुमति हेतु दायर याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की स्पष्ट एवं असंदिग्ध राय — जिसमें जान का गंभीर खतरा बताया गया हो — को सहानुभूति के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता।
जिला कुलगाम की लगभग 14 वर्षीय पीड़िता यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप गर्भवती हुई। याचिका दायर होने के समय गर्भावस्था लगभग 25 सप्ताह 5 दिन की थी, जो MTP अधिनियम, 1971 की वैधानिक सीमा से अधिक थी। बाल कल्याण समिति, कुलगाम ने पीड़िता को "देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाला बालक" घोषित किया था।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि बलात्कार जनित गर्भ को जारी रखने पर विवश करना अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन, गरिमा एवं शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार का उल्लंघन है। S बनाम भारत संघ (SLP 14454/2026) का हवाला देते हुए कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने 28 सप्ताह में MTP की अनुमति दी थी।
न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की राय को सर्वोपरि मानते हुए कहा कि लगभग 27 सप्ताह की गर्भावस्था में समाप्ति से गर्भाशय-उच्छेदन, अत्यधिक रक्तस्राव, सेप्सिस और दीर्घकालिक बांझपन का गंभीर खतरा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 में प्रजनन स्वायत्तता के साथ-साथ जीवन की रक्षा भी समाहित है। समाप्ति का अधिकार निरपेक्ष नहीं है।
न्यायालय ने A (X की माता) बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) तथा सुश्री X बनाम कर्नाटक राज्य (2026) का अनुसरण किया, जिनमें कहा गया था कि जहाँ मेडिकल बोर्ड जीवन को खतरा बताए, वहाँ न्यायालय MTP की अनुमति देने से बचें।
उच्च न्यायालय ने सरकारी लल्लाडेड अस्पताल को पीड़िता की निःशुल्क प्रसव-पूर्व एवं प्रसवोत्तर चिकित्सा, गोपनीयता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। मासिक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी आदेश दिया गया।
Case Details:
Case No.: WP(C) 1016/2026
Bench: Justice Wasim Sadiq Nargal
Petitioner: Minor Victim "X" through her father
Respondents: Union Territory of J&K & Others
Picture Source :