मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक और दार्शनिक फैसला सुनाते हुए, अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने वाले एक व्यक्ति की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने माना कि मृत्युदंड की तुलना में दोषी को उसके अपराध बोध के साथ जिंदा रखना और तिल-तिल कर मरने देना अधिक प्रभावी सजा है।

अदालत का मुख्य तर्क: फांसी से बड़ा दंड है आत्मग्लानि के साथ जीना

हाईकोर्ट ने मौत की सजा पर एक विस्तृत दार्शनिक टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि फांसी की सजा अंतिम, तात्कालिक और अपरिवर्तनीय है। यह न केवल जीवन को समाप्त कर देती है, बल्कि पश्चाताप या नैतिक सुधार की संभावना को भी खत्म कर देती है।

अदालत ने माना कि दोषी को जिंदा रखकर उसे अपनी अंतरात्मा के साथ आजीवन संवाद करने के लिए छोड़ देना न्याय के उद्देश्यों को अधिक बेहतर ढंग से पूरा करता है। कोर्ट ने कहा, 'जहां मृत्युदंड किताब को हमेशा के लिए बंद कर देता है, वहीं आजीवन कारावास अपराधी को अपने प्राकृतिक जीवन के अंत तक हर पन्ने को बार-बार पढ़ने के लिए मजबूर करता है।'

अदालत ने यह भी नोट किया कि मुर्गन नाम का यह दोषी पहले से ही अपने परिवार और समाज द्वारा पूरी तरह से त्याग दिया गया है और वह एक जीवित निर्वासन जैसी कठोर स्थिति का सामना कर रहा है, जो कि अपने आप में एक गंभीर सजा है।

सजा की सख्त शर्तें

"अदालत ने स्पष्ट किया कि मुर्गन को दी गई उम्रकैद की सजा उसके प्राकृतिक जीवन के अंत तक लागू रहेगी। उसे समय से पहले रिहाई का कोई अधिकार नहीं होगा। उसे सजा में छूट या किसी भी प्रकार की माफी नहीं मिलेगी। उसे अपनी मृत्यु तक जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।

क्या था पूरा मामला?

मुर्गन ने अपनी पत्नी की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर अपनी 14 वर्षीय सगी बेटी का यौन शोषण किया। पीड़िता ने अदालत को बताया कि उसके साथ 20 से अधिक बार यौन उत्पीड़न किया गया। यह दिल दहला देने वाला मामला 5 फरवरी, 2025 को तब सामने आया जब पीड़िता की मां ने बेटी के शरीर में कुछ बदलाव देखे और उसे डॉक्टर के पास ले गई।

"मेडिकल जांच में पुष्टि हुई कि नाबालिग लड़की लगभग पांच महीने की गर्भवती थी। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उसका सुरक्षित गर्भपात कराया गया। डीएनए (DNA) जांच से इस बात की अकाट्य पुष्टि हो गई कि भ्रूण का जैविक पिता मुर्गन ही था।

निचली अदालत (पोक्सो कोर्ट) का फैसला

"5 जनवरी, 2026 को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत बनी एक विशेष अदालत ने मुर्गन को धारा 6 के तहत 'गंभीर प्रवेशन यौन हमले' का दोषी माना था और उसे फांसी की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के न्यायाधीश ने इसे पिता द्वारा किया गया 'भयानक विश्वासघात' करार देते हुए कहा था कि ऐसा अपराधी समाज के लिए खतरा है। अपराध की चरम प्रकृति और बच्ची को पहुंचे शारीरिक व मानसिक आघात को देखते हुए जज ने कहा था कि मौत की सजा से कम कोई भी दंड न्याय के लिए अपर्याप्त होगा।

हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को क्यों पलटा?

हाईकोर्ट ने रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी में नहीं:

निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए की मुख्य कारण बताए।

" सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार फांसी केवल 'दुर्लभ से दुर्लभ' मामलों में दी जाती है। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि यह अपराध घृणित है, लेकिन यौन कृत्य के अलावा पीड़िता के साथ अलग से कोई शारीरिक क्रूरता (जैसे मारपीट या यातना) करने के सबूत नहीं मिले हैं, इसलिए यह इस श्रेणी में नहीं आता।

'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी में नहीं:" सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार फांसी केवल 'दुर्लभ से दुर्लभ' मामलों में दी जाती है। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि यह अपराध घृणित है, लेकिन यौन कृत्य के अलावा पीड़िता के साथ अलग से कोई शारीरिक क्रूरता (जैसे मारपीट या यातना) करने के सबूत नहीं मिले हैं, इसलिए यह इस श्रेणी में नहीं आता।"

सुधार की गुंजाइश: राज्य सरकार यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही कि दोषी में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है, जो कि मृत्युदंड देने के लिए एक अनिवार्य शर्त है

भावनाओं से प्रभावित फैसला:  हाईकोर्ट ने निचली अदालत के ट्रायल में खामियां पाईं और कहा कि ट्रायल जज शायद अपराध की भयावहता, भावनाओं और संवेदनाओं से प्रभावित होकर फांसी की सजा सुना बैठे थे।"

हाईकोर्ट ने मुर्गन की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन उसकी सजा को मृत्युदंड से घटाकर उसके बचे हुए जीवन के लिए कठोर उम्रकैद में तब्दील कर दिया।

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