गोकशी के आरोपी को एनएसए मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका मिला है। कोर्ट ने एनएसए के तहत निरुद्ध याची की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि गोकशी (Cow Slaughter) की घटनाएं केवल सामान्य कानून व्यवस्था के उल्लंघन का मामला नहीं है, बल्कि ये समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से आहत करती हैं।
क्या है ये पूरा मामला?
इतना ही नहीं गोकशी की घटनाएं सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की भी क्षमता रखती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शामली के समीर के ऊपर लगे एनएसए को बरकरार रखा। 2025 में शामली के झिंझाना में गोवंश के अवशेष मिले थे। जिसके बाद इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैल गया था। डीएम ने गिरफ्तार आरोपी के खिलाफ एनएसए की कार्रवाई की थी।
3 मुख्य आरोपियों को किया था गिरफ्तार
इस घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने तीन टीमों का गठन किया था। 17 मार्च 2025 की रात को पुलिस और गो-तस्करों के बीच मुंडेट तिराहे के पास मुठभेड़ हुई, जिसमें दो आरोपी पुलिस की जवाबी फायरिंग में घायल हुए और एक ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों ने पूछताछ के दौरान अपना अपराध स्वीकार किया।
आरोपियों पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम)
इस घटना के बाद हिंदू संगठनों ने कड़ा विरोध प्रदर्शन किया था और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की थी। क्षेत्र में शामली पुलिस ने गोकशी रोकने के लिए विशेष अभियान भी चलाया था, जिसके तहत बाद में कुछ आरोपियों पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) भी लगाया गया।
आर्म्स एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज
इससे पहले हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल के अपने आदेश में कहा कि सिर्फ गायों या उनके गोवंश को राज्य के अंदर ले जाना जुर्म नहीं कहा जा सकता। मार्च 2024 में याचिकाकर्ता के खिलाफ यूपी काउ स्लॉटर प्रिवेंशन एक्ट, प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स एक्ट, इंडियन पीनल कोड और आर्म्स एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता का ड्राइवर ट्रक में गायों को ले जा रहा था। याचिकाकर्ता के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ी को बाद में जब्त कर लिया गया। अपनी गाड़ी जब्त होने से दुखी होकर उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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