इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम व्यक्ति को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने मुरादाबाद के एक युवक की हिरासत को अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में उचित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है और इस संबंध में किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह आदेश मोहम्मद आसिफ द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किया गया था। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने की।
हाईकोर्ट ने मुरादाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा 1 अप्रैल, 2026 को जारी रिमांड आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील ने अदालत के समक्ष यह दलील दी कि पुलिस द्वारा तैयार किए गए गिरफ्तारी मेमो के कॉलम 13 में गिरफ़्तारी के अनिवार्य आधारों का जिक्र तक नहीं किया गया था, जो कि कानून द्वारा अनिवार्य एक शर्त है। इसके अतिरिक्त यह तर्क भी दिया गया कि मजिस्ट्रेट ने रिमांड का आदेश एक पहले से छपे हुए प्रोफॉर्मा पर जारी किया, जिससे यह आभास होता है कि मामले के तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि यह पूरी प्रक्रिया कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने विशेष रूप से अपने पूर्व के फैसले “उमंग रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य” का हवाला दिया और कहा कि वर्तमान मामला उस निर्णय में तय किए गए मानकों के विपरीत है। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि गिरफ्तारी के कारणों का उल्लेख और न्यायिक संतुष्टि के बाद ही रिमांड आदेश पारित किया जाना चाहिए। खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि गिरफ्तारी के आधारों का उल्लेख न करना और यांत्रिक तरीके से रिमांड आदेश पारित करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी और हिरासत को असंवैधानिक और अवैध घोषित किया जाता है। हाईकोर्ट ने तत्काल प्रभाव से युवक को रिहा करने का निर्देश दिया।
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