सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि केवल अपनी बहस की स्किल दिखाने के लिए अदालत का कीमती समय बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि कोर्ट का वक्त उन दलीलों में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए, जो पहले से तय कानूनी स्थिति और बाध्यकारी नजीरों के खिलाफ हों।
कोर्ट ने कहा कि जब अदालतें नजीरों के सिद्धांत से बंधी होती हैं और संविधान पीठ के फैसलों का पालन करना उनका दायित्व होता है, तब वकीलों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे लागू और प्रभावी नजीरों का सम्मान करें।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- अपनी स्किल दिखाने के लिए अदालत का समय बर्बाद न करें: सुप्रीम कोर्ट
- शीर्ष अदालत ने वकीलों को नजीरों का सम्मान करने की नसीहत दी
- कहा- बाध्यकारी संविधान बेंच के फैसले के खिलाफ बेवजह बहस उचित नहीं
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा कि यदि किसी पुराने फैसले से अलग स्थिति दिखाने के लिए कोई असाधारण आधार उपलब्ध न हो, तो केवल तर्क स्किल (कौशल) दिखाने के लिए नहीं दी जानी चाहिए, जिनका बाध्यकारी नजीर के सामने कोई महत्व न हो। कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह की बहस सार्वजनिक समय की बर्बादी है।
क्या था मामला
यह टिप्पणी एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें मुख्य सवाल यह था कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 के तहत लिमिटेशन अवधि की गणना किस तारीख से होगी। विवाद इस बात पर था कि प्रासंगिक तारीख आपराधिक शिकायत दाखिल होने की मानी जाए या फिर वह तारीख जब मजिस्ट्रेट संज्ञान ले।
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