भारत की न्यायपालिका को झकझोर देने वाला “घर में नकदी” विवाद अब अपने नाटकीय अंत तक पहुंच गया है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा देकर इसे भारत के राष्ट्रपति को सौंप दिया है। वे हाल के समय में संसदीय जांच के बीच पद छोड़ने वाले सबसे चर्चित न्यायाधीशों में से एक बन गए हैं।
यह इस्तीफा ऐसे समय आया है जब न्यायाधीश जाँच अधिनियम, 1968 के तहत गठित तीन सदस्यीय जांच समिति पहले ही उनके खिलाफ आरोपों की जांच कर रही थी। इस घटनाक्रम को भारत में न्यायिक जवाबदेही के लिहाज से एक अहम मोड़ माना जा रहा है।
यह विवाद 14 मार्च 2025 को शुरू हुआ, जब दिल्ली उच्च न्यायालयमें तैनात रहते हुए न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर लगी आग बुझाने पहुंचे दमकल कर्मियों को परिसर के एक हिस्से में भारी मात्रा में कथित रूप से अघोषित नकदी मिली। एक साधारण आग बुझाने की घटना देखते ही देखते संवैधानिक संकट में बदल गई।
न्यायमूर्ति वर्मा ने इस पूरे प्रकरण में कानूनी लड़ाई भी लड़ी। उन्होंने आंतरिक जांच प्रक्रिया और भारत के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश को चुनौती दी, साथ ही लोक सभा के अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ भी याचिका दायर की। हालांकि, उनकी दोनों याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दीं।
146 सांसदों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया। इस समिति में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता वासुदेव आचार्य शामिल थे।
जब सभी कानूनी रास्ते लगभग बंद हो चुके थे और औपचारिक जांच प्रक्रिया पूरी तरह सक्रिय हो गई थी, तब न्यायमूर्ति वर्मा ने जांच का सामना करने के बजाय इस्तीफा देने का फैसला किया। उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा, “मैं गहरी पीड़ा के साथ अपना इस्तीफा देता हूं।”
इस इस्तीफे के साथ ही जांच प्रक्रिया अपने निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले ही समाप्त हो गई, जिससे यह मूल सवाल अनुत्तरित रह गया कि उनके आवास पर इतनी बड़ी मात्रा में नकदी आखिर आई कैसे।
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