राजस्थान हाईकोर्ट में भोपा नायक समुदाय के वर्गीकरण को लेकर चल रहे अहम मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग की रिपोर्ट पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। यह मामला सामाजिक वर्गीकरण और आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को छूता है, जिस पर राज्यभर में नजर बनी हुई है।

यह सुनवाई न्यायाधीश डॉ। पुष्पेंद्र सिंह भाटी और न्यायाधीश संदीप शाह की खंडपीठ के समक्ष हुई। इस मामले में याचिकाकर्ता रामचरण ने जनहित याचिका (PIL) दायर की है। याचिका में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया है कि “भोपा” कोई जाति नहीं है, बल्कि यह एक पारंपरिक पेशा है, जिसे नायक समुदाय के लोग निभाते हैं। इसलिए इसे जाति के रूप में मान्यता देकर ओबीसी वर्ग में शामिल करना न्यायसंगत नहीं है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए। सरकार का कहना है कि यह रिपोर्ट यह स्पष्ट करने में मदद करेगी कि आयोग के गठन से पहले भोपा नायक समुदाय की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति क्या रही है। यानी, इस रिपोर्ट के आधार पर यह तय करना आसान होगा कि समुदाय को किस वर्ग में रखा जाना चाहिए।

अदालत ने राज्य सरकार की इस मांग को स्वीकार करते हुए कहा कि मामले में किसी भी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए ओबीसी आयोग की रिपोर्ट बेहद जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना तथ्यात्मक और आधिकारिक रिपोर्ट के इस तरह के संवेदनशील सामाजिक मुद्दे पर निर्णय लेना उचित नहीं होगा। इसी कारण राज्य सरकार को रिपोर्ट पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।

गौरतलब है कि इस याचिका में वर्ष 2013 के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें नायक (भोपा) समुदाय को अनुसूचित जाति (SC) की सूची से हटाकर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल किया गया था। इस बदलाव के बाद से ही समुदाय के वर्गीकरण को लेकर विवाद बना हुआ है और अब यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

यह केस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका प्रभाव न केवल भोपा नायक समुदाय पर पड़ेगा, बल्कि राज्य में अन्य समुदायों के वर्गीकरण और आरक्षण नीति पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। अब इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जब राज्य सरकार ओबीसी आयोग की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करेगी।

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