दिल्ली की साकेत कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा दायर 25 साल पुराने आपराधिक मानहानि मामले में दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार (वीके) सक्सेना को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यह फैसला ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास राघव शर्मा ने बृहस्पतिवार को सुनाया। मामला 10 नवंबर 2000 को अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन से जुड़ा है। उस समय वीके सक्सेना नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के अध्यक्ष थे। विज्ञापन का शीर्षक था ट्रू फेस ऑफ मिस मेधा पाटकर एंड हर नर्मदा बचाओ आंदोलन। इसमें नर्मदा बचाओ आंदोलन और मेधा पाटकर की आलोचना की गई थी तथा गुजरात में सरदार सरोवर बांध परियोजना का समर्थन किया गया था, जिसका एनबीए विरोध कर रहा था। मेधा पाटकर ने इस विज्ञापन के जवाब में प्रेस नोट जारी किया और मानहानि का केस दायर किया।
इससे पहले मेधा पाटकर को अदालत ने किया था बरी
यह मामला आपसी है। इससे पहले 2006 में वीके सक्सेना ने मेधा पाटकर के खिलाफ एक अलग मानहानि का केस दायर किया था, जिसमें एक टीवी कार्यक्रम में कथित बयान पर आधारित था। उस मामले में ट्रायल कोर्ट ने मेधा पाटकर को दोषी ठहराया था, सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी लेकिन 1 लाख रुपये के जुर्माने को हटा दिया। हालांकि बीती 24 जनवरी 2026 को साकेत कोर्ट ने उसी मामले में मेधा पाटकर को बरी कर दिया था, क्योंकि सक्सेना मूल वीडियो फुटेज या रिकॉर्डिंग डिवाइस पेश नहीं कर सके और आरोप साबित नहीं हुए।
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