इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1983 के गैंगरेप के एक मामले के तीन आरोपियों को बरी किया है। तीनों 1984 में सात-सात की सजा हुई थी। यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने संदेह के लाभ में दिया। कोर्ट ने पाया कि एफआईआर दर्ज करने में बिना किसी वजह देरी हुई और मामले की पुष्टि करने वाले मेडिकल सबूतों की पूरी तरह कमी है। कोर्ट ने एफआईआर को अस्पष्ट भी बताया क्योंकि पीड़िता के साथ चार लोगों द्वारा रेप का आरोप था और एफआईआर में सिर्फ तीन लोगों के नाम थे। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से यह भरोसा नहीं होता कि आरोपियों ने रेप किया क्योंकि अभियोजन पक्ष के प्रत्यक्ष और दस्तावेजी सबूतों से रेप के अपराध में आरोपी अपीलार्थियों की संलिप्तता साबित नहीं होती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सात माह की गर्भवती महिला के साथ चार लोगों ने एक घंटे तक गैंग रेप किया होता तो इससे गंभीर मेडिकल इमरजेंसी पैदा होने की पूरी संभावना थी लेकिन मेडिकल रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं है।
"इसी के साथ कोर्ट ने इस मामले में मथुरा के अपर सत्र न्यायाधीश के मई 1984 के निर्णय को रद्द कर दिया। सेशन कोर्ट ने अपीलार्थी हेतराम, शंकर व भूदत को आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल कैद की सज़ा सुनाई थी। मामले के तथ्यों के अनुसार था कि 9 मई 1983 को शिकायतकर्ता अपनी बकरियां चराकर घर लौटा तो उसने पाया कि उसका घर अंदर से बंद था।"
घर की चारदीवारी फांदकर अंदर जाने पर, उसने तीन लोगों को भागते हुए देखा। उसकी पत्नी (पीड़िता) उस समय सात महीने की गर्भवती थी। उसने उसे बताया कि चार लोगों ने जिनमें एक अनजान ड्राइवर भी शामिल था, चाकू की नोक पर उसके साथ लगभग एक घंटे तक रेप किया। एफआईआर घटना के पांच दिन बाद 14 मई 1983 को दर्ज की गई। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को इस आधार पर सही ठहराया कि शिकायतकर्ता को आरोपियों से डर था क्योंकि शिकायतकर्ता गांव में एकमात्र अनुसूचित जाति का परिवार था।
ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को मान लिया और आरोपियों को दोषी ठहराया। ट्रायल कोर्ट मुख्य रूप से पति, पीड़िता व एक स्वतंत्र गवाह की आंखों देखी गवाही पर भरोसा किया। ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता के हाथों में जो चोटें थीं, वे शायद सूख गई होंगी। ये चोटें उसे टूटी हुई चूड़ियों की वजह से लगी थीं।
हाईकोर्ट को अभियोजन के केस में कई बड़ी कमियां मिलीं। सबूत हिंसक गैंगरेप के आरोपों का समर्थन नहीं करते थे। कोर्ट ने पाया कि घटना के पांच दिन बाद तैयार की गई मेडिको लीगल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं मिला। पैथोलॉजिकल रिपोर्ट ने पुष्टि की कि वह सात महीने की गर्भवती थी और उसकी प्रेग्नेंसी सामान्य थी।
कोर्ट ने लल्लीराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हालांकि रेप साबित करने के लिए शारीरिक चोट का होना अनिवार्य नहीं है, लेकिन जब पीड़िता की गवाही में विश्वसनीयता की कमी होती है तो चोट का न होना अहम पहलू बन जाता है। हाईकोर्ट ने पीड़िता के इस दावे को भी खारिज किया कि हमले के दौरान टूटी हुई चूड़ियों की वजह से उसके हाथों से खून बहा था।
कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को घटनास्थल से कोई टूटी हुई चूड़ी नहीं मिली और डॉक्टर ने भी ऐसी किसी चोट का ज़िक्र नहीं किया। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन के सबूतों पर भरोसा नहीं किया जा सकता इसलिए कोर्ट ने अपीलार्थियों को बरी कर दिया।
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