दिल्ली विक्रय कर अधिनियम, 1975
(1975 का अधिनियम संख्यांक 43)
[7 अगस्त, 1975]
दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र में माल के विक्रय पर कर के उद्गृहण से संबंधित विधि का
समेकन और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छब्बीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली विक्रय कर अधिनियम, 1975 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त दिल्ली का प्रशासक अभिप्रेत है;
(ख) अपील अधिकरण" से धारा 13 के अधीन गठित अपील अधिकरण अभिप्रेत है;
(ग) कारबार" के अन्तर्गत-
(i) कोई व्यापार, वाणिज्य या विनिर्माण अथवा कोई ऐसा प्रोद्यम या समुत्थान भी है जो व्यापार, वाणिज्य या विनिर्माण की प्रकृति का है, चाहे ऐसे व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या समुत्थान को अभिलाभ या लाभ कमाने के उद्देश्य से चलाया जाता है या नहीं और चाहे ऐसे व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या समुत्थान से कोई अभिलाभ या लाभ होता है या नहीं; और
(ii) ऐसे व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण, प्रोद्यम या समुत्थान से सम्बद्ध या प्रासंगिक या उसके आनुषंगिक कोई संव्यहार भी है;
(घ) आयुक्त" से धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त विक्रय कर आयुक्त अभिप्रेत है;
(ङ) व्यौहारी" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो दिल्ली में माल के विक्रय का कारबार चलाता है और इसके अन्तर्गत-
(i) केन्द्रीय सरकार या वह राज्य सरकार भी है जो ऐसा कारबार चलाती है;
(ii) कोई निगमित सोसाइटी (जिसके अन्तर्गत सहकारी सोसाइटी भी है), क्लब या संगम भी है जो अपने सदस्यों को नकद या आस्थगित संदाय पर या कमीशन, पारिश्रमिक अथवा अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए, माल का विक्रय या प्रदाय करता है, चाहे वह कारबार के अनुक्रम में हो या उससे अन्यथा;
(iii) कोई प्रबन्धक, आढ़तिया, दलाल, कमीशन अभिकर्ता, प्रत्यायक अभिकर्ता या कोई वाणिज्यिक अभिकर्ता भी है, चाहे वह किसी भी नाम से पुकारा जाता हो और चाहे वह इसमें इसके पूर्व यथा उल्लिखित वर्णन का हो या नहीं तथा जो किसी ऐसे मालिक के माल का विक्रय करता है जिसे प्रकट किया गया हो या नहीं; और
(iv) कोई ऐसा नीलामकर्ता भी है जो किसी ऐसे मालिक के माल का विक्रय या नीलाम करता है जिसे प्रकट किया गया है या नहीं और चाहे आशयित क्रेता की प्रस्थापना उसके द्वारा या मालिक द्वारा या मालिक के किसी नामनिर्देशिती द्वारा प्रतिगृहीत की जाती है या नहीं;
(च) दिल्ली" से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है;
(छ) माल" के अन्तर्गत सभी सामग्री, वस्तुएं, वाणिज्या तथा अन्य सभी प्रकार की जंगम सम्पत्ति भी है, किन्तु इसके अन्तर्गत समाचारपत्र, अनुयोज्य दावे, स्टाक, शेयर, प्रतिभूति या धन नहीं है;
(ज) उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित विनिर्माण" से किसी माल को उत्पादित करना, निर्मित करना, निष्कर्षित करना, परिवर्तित करना, अलंकृत करना, परिसाधित करना या अन्यथा प्रसंस्कृत करना, अभिक्रियित करना या अनुकूलित करना अभिप्रेत है किन्तु इसके अन्तर्गत विनिर्माण की ऐसी कोई प्रक्रिया या ढंग नहीं है जो विहित किया जाए;
(झ) राजपत्र" से दिल्ली राजपत्र अभिप्रेत है;
(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ट) रजिस्ट्रीकृत" से इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत अभिप्रेत है;
(ठ) उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित विक्रय" से माल में सम्पत्ति का एक व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को नकद या आस्थगित संदाय पर या किसी अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए कोई अन्तरण अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत-
(i) अवक्रय द्वारा या किस्तों में संदाय की अन्य पद्धति द्वारा माल का अंतरण भी है किन्तु इसके अन्तर्गत माल का बंधक या आड्मान या उसका भारित किया जाना या गिरवी रखा जाना नहीं है;
(ii) किसी सोसाइटी (जिसके अंतर्गत सहकारी सोसाइटी भी है), क्लब, फर्म या किसी संगम द्वारा अपने सदस्यों को नकद या आस्थगित संदाय पर या कमीशन, पारिश्रमिक अथवा अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए माल का प्रदाय भी है चाहे वह कारबार के अनुक्रम में हो या उससे अन्यथा; और
(iii) खण्ड (ङ) के उपखण्ड (iv) में निर्दिष्ट नीलामकर्ता द्वारा माल का अन्तरण भी है;
(ड) विक्रय कीमत" से किसी माल के विक्रय के लिए प्रतिफल के रूप में किसी व्यौहारी को संदेय ऐसी रकम अभिप्रेत है, जैसी कि वह व्यापार की प्रसामान्य प्रचलित प्रथा के अनुसार नकद बट्टे के रूप में अनुज्ञात राशि को घटा करके किन्तु यदि ढुलाई या परिदान या खर्च या प्रतिष्ठापन का खर्च अलग से प्रभारित किया जाता है तो उस खर्च से भिन्न ऐसी राशि को सम्मिलित करके आए जो उस माल की बाबत उसके परिदान के समय या उसके पूर्व उस व्यौहारी द्वारा की गई किसी बात के लिए प्रभारित की गई है;
(ढ) कर" से इस अधिनियम के अधीन संदेय विक्रय कर अभिप्रेत है;
(ण) आवर्त" से किसी वर्ष में किसी विहित अवधि के दौरान माल के किए गए किसी विक्रय की बाबत व्यौहारी द्वारा प्राप्य, अथवा, यदि व्यौहारी ऐसी निर्वाचन करे तो, वस्तुतः प्राप्त विक्रय कीमत की रकमों का ऐसा योग अभिप्रेत है जैसा कि वह विक्रय कीमत की उस रकम को, यदि कोई हो, घटाने के पश्चात् आए जो क्रेता द्वारा क्रय किए गए और विहित अवधि के भीतर लौटा दिए गए किसी माल की बाबत व्यौहारी द्वारा क्रेता को वापस की गई हो :
परन्तु यथा पूर्वोक्त निर्वाचन, एक बार कर लिए जाने पर आयुक्त की अनुज्ञा से और ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर ही जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे, परिवर्तित किया जाएगा, अन्यथा नहीं;
(त) वर्ष" से वित्तीय वर्ष अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
कर का भार और उद्ग्रहण
3. कर का भार-(1) प्रत्येक व्यौहारी जिसका आवर्त इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान कराधेय रकम से अधिक है और प्रत्येक व्यौहारी जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन रजिस्ट्रीकृत है या कर देने का जिम्मेदार है, ऐसे प्रारम्भ से या उसके पश्चात् अपने द्वारा किए गए सभी विक्रयों पर इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार होगा ।
(2) प्रत्येक व्यौहारी जिसे उपधारा (1) लागू नहीं होती है-
(i) उस दिन से ठीक अगली तारीख से जिस दिन किसी वर्ष के प्रारम्भ से संगणित उसका आवर्त प्रथम बार ऐसे वर्ष के भीतर कराधेय रकम से अधिक हो जाता है उस दिन के पश्चात् अपने द्वारा किए गए सभी विक्रयों पर इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार होगा;
(ii) यदि वह केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन कर देने का जिम्मेदार हो जाता है या, अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् किसी समय उक्त अधिनियम के अधीन व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत होता है तो, उन सभी विक्रयों पर कर देने का जिम्मेदार होगा जो उसके द्वारा या उसकी ओर से दिल्ली के भीतर उस तारीख को या उसके पश्चात् जिसको वह उक्त अधिनियम के अधीन इस प्रकार जिम्मेदार होता है या रजिस्ट्रीकृत होता है, इनमें से जो भी तारीख पूर्वतर हो, किए गए हों ।
(3) प्रत्येक व्यौहारी जो इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार हो गया है, तीन क्रमवर्ती वर्षों की समाप्ति तक जिनमें से प्रत्येक वर्ष के दौरान उसका आवर्त कराधेय रकम से अधिक नहीं हुआ है और ऐसी समाप्ति की तारीख के पश्चात् ऐसी अतिरिक्त अवधि तक जो विहित की जाए, इस प्रकार जिम्मेदार बना रहेगा और ऐसी अतिरिक्त अवधि की समाप्ति पर कर देने की उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाएगी :
परन्तु कोई व्यौहारी उस वर्ष के, जिसमें उसका आवर्त कराधेय रकम से अधिक नहीं हुआ है, अगले एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के रद्द किए जाने के लिए आवेदन कर सकेगा और ऐसे रद्द किए जाने पर कर देने की उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाएगी :
परन्तु यह और कि कोई व्यौहारी किसी ऐसे माल की बाबत जो ऐसे रद्द किए जाने की तारीख के पूर्व उसके द्वारा क्रय किया गया हो और जिसका विक्रय न किया गया हो या उस प्रयोजन के लिए उपयोग न किया गया हो जिसके लिए वह क्रय किया गया था, उतना कर देने का जिम्मेदार होगा जितना कर तब संदेय होता जब वह ऐसे माल के क्रय किए जाने की तारीख को व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत नहीं हुआ होता ।
(4) प्रत्येक व्यौहारी, जिसकी इस अधिनियम के अधीन कर देने की जिम्मेदारी उपधारा (3) के अधीन समाप्त हो गई है, यदि किसी वर्ष के प्रारम्भ से संगणित उसका आवर्त ऐसे वर्ष के भीतर किसी दिन कराधेय रकम से पुनः अधिक हो जाता है तो उस दिन से ठीक अगली तारीख से जिस दिन उसका आवर्त प्रथम बार कराधेय रकम से अधिक हो जाता है, उस दिन के पश्चात् अपने द्वारा किए गए सभी विक्रयों पर ऐसा कर देने का जिम्मेदार होगा ।
(5) कोई व्यौहारी, जिसका रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारा 20 की उपधारा (3) के अधीन रद्द किया गया है,-
(क) यदि ऐसे प्रमाणपत्र के रद्द किए जाने की तारीख से संगणित उसका आवर्त वर्ष के भीतर किसी दिन कराधेय रकम से अधिक हो जाता है; या
(ख) यदि किसी पश्चात्वर्ती वर्ष के प्रारम्भ से संगणित उसका आवर्त उस वर्ष के भीतर किसी दिन कराधेय रकम से अधिक हो जाता है,
तो उस दिन से ठीक अगली तारीख से जिस दिन ऐसा आवर्त प्रथम बार कराधेय रकम से पुनः अधिक हो जाता है, उस दिन के पश्चात् दिल्ली के बाहर से उसके द्वारा आयातित या दिल्ली में उसके द्वारा विनिर्मित अथवा इस अधिनियम के अधीन उद्ग्रहणीय कर का संदाय किए बिना उसके द्वारा क्रय किए गए माल के अपने द्वारा किए गए सभी विक्रयों पर इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार होगा ।
(6) कोई भी व्यौहारी, जो तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट एक या अधिक वर्गों के माल में अनन्यतः व्यौहार करता है, इस अधिनियम के अधीन कोई कर देने का जिम्मेदार नहीं होगा ।
(7) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, कराधेय रकम" से अभिप्रेत है,-
(क) किसी ऐसे व्यौहारी के संबंध में जो दिल्ली में किसी माल का विक्रय के लिए आयात
करता है . कुछ नहीं,
(ख) किसी ऐसे व्यौहारी के संबंध में जो विनिर्मित माल के मूल्य को ध्यान में रखे बिना
विक्रय के लिए माल का विनिर्माण करता है . 30,000.00 रु०;
(ग) किसी अन्य व्यौहारी के संबंध में . 1,00,000.00 रु० :
परन्तु यदि प्रशासक की यह राय है कि लेखे रखने में कठिनाई को ध्यान में रखते हुए या अन्य पर्याप्त कारण से, खण्ड (ख) के अन्तर्गत आने वाले व्यौहारियों के किसी वर्ग की बाबत कराधेय रकम में वृद्धि की जानी चाहिए तो प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, व्यौहारियों के ऐसे वर्ग की बाबत एक लाख रुपए से अनधिक ऐसी कराधेय रकम, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, नियत कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-उपधारा (7) के अधीन कराधेय रकम की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए, व्यौहारी द्वारा किए गए सभी विक्रयों के आवर्त को हिसाब में लिया जाएगा भले ही ऐसे विक्रय इस अधिनियम के अधीन कराधेय हों या नहीं ।
4. कर की दर-(1) किसी व्यौहारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन संदेय कर-
(क) प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट माल की बाबत कराधेय आवर्त की दशा में, रुपए में बारह पैसे की दर से;
(ख) द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट माल की बाबत कराधेय आवर्त की दशा में, रुपए में चार पैसे से अनधिक की ऐसी दर से जो केन्द्रीय सरकार समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अवधारित करे;
(ग) ऐसे होटल या रेस्तरां या उसके भाग में जहां कैबरे, फ्लोर शो या वैसे ही मनोरंजन की व्यवस्था की जाती है, उपभोग के लिए दिए जाने वाले किसी खाद्य या पेय की बाबत कराधेय आवर्त की दशा में, रुपए में चालीस पैसे की दर से;
(घ) किसी अन्य माल की बाबत काराधेय आवर्त की दशा में, रुपए में सात पैसे की दर से,
उद्गृहीत किया जाएगा :
परन्तु प्रशासक, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, प्रथम अनुसूची या द्वितीय अनुसूची में, या तो भूतलक्षी रूप से या भविष्यलक्षी रूप से, परिवर्धन कर सकेगा या उसमें से लोप कर सकेगा या उसको अन्यथा संशोधित कर सकेगा और तब, यथास्थिति, प्रथम अनुसूची या द्वितीय अनुसूची तद्नुसार संशोधित समझी जाएगी :
परन्तु यह और कि यदि ऐसे संशोधन से किसी व्यौहारी के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो ऐसी कोई संशोधन भूतलक्षी रूप से नहीं किया जाएगा :
परन्तु यह और भी कि यदि किसी माल या माल के वर्ग की बाबत प्रशासक की यह राय है कि ऐसी करना जनसाधारण के हित में समीचीन है तो वह, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगा कि ऐसे माल या माल के वर्ग के कराधेय आवर्त की बाबत कर, ऐसी शर्तों के अधीन, जो विनिर्दिष्ट की जाएं, इस धारा के अधीन लागू दर से अनधिक की ऐसी उपान्तरित दर से जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उद्गृहीत किया जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, कराधेय आवर्त" से किसी वर्ष में विहित अवधि के दौरान व्यौहारी के आवर्त का वह भाग अभिप्रेत है जो उसमें से,-
(क) उस अवधि के दौरान निम्नलिखित पर उसके आवर्त की कटौती करने के पश्चात् बाकी बचता है-
(i) माल का विक्रय, वह विक्रय बिन्दु जिस पर ऐसा माल कराधेय होगा, प्रशासक द्वारा धारा 5 के अधीन विनिर्दिष्ट किया गया है और जिसकी बाबत आयुक्त को समाधानप्रद रूप में यह दर्शित कर दिया जाता है कि देय कर का संदाय कर दिया गया है ;
(ii) धारा 7 के अधीन कर-मुक्त घोषित माल का विक्रय ;
(iii) माल का विक्रय जो धारा 8 के अधीन कर के दायित्वाधीन नहीं है;
(iv) ऐसे माल का विक्रय, जिसके बारे में आयुक्त को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि वह व्यौहारी के रजिस्ट्रीकरण की तारीख से बारह मास की अवधि के भीतर क्रय किया गया था और बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल अधिनियम 6) जैसा कि वह उस समय प्रवृत्त था, के अधीन या इस अधिनियम के अधीन उस पर कर लगाया जा चुका है;
(v) किसी रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी को-
(क) ऐसे व्यौहारी के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट वर्ग या वर्गों के माल का विक्रय, जो तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट माल से भिन्न, किसी माल के या समाचारपत्र के दिल्ली में विनिर्माण में कच्ची सामग्री के रूप में उसके द्वारा उपयोग के लिए आशयित है-
(1) दिल्ली के भीतर उसके द्वारा विक्रय के लिए; या
(2) अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में उसके द्वारा विक्रय के लिए जो ऐसा विक्रय है जिससे ऐसे माल का दिल्ली से संचलन होता है या जो ऐसे संचलन के दौरान ऐसे माल पर हक की दस्तावेजों के अन्तरण से किया जाता है; या
(3) भारत के बारह निर्यात के अनुक्रम में उसके द्वारा विक्रय के लिए, जो ऐसा विक्रय है जिससे ऐसे माल का दिल्ली से संचलन होता है या जो ऐसा विक्रय है जो ऐसे माल के दिल्ली से भारत से बाहर किसी स्थान को संचलन के दौरान और भारत के सीमाशुल्क सीमान्त से माल के पार हो जाने के पश्चात् ऐसे माल पर हक की दस्तावेजों के अन्तरण से किया जाता है; या
(ख) ऐसे व्यौहारी के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट वर्ग या वर्गों के माल का विक्रय, जो दिल्ली में उसके द्वारा पुनः विक्रय के लिए अथवा, यथास्थिति, मद (क) की उप-मद (2) या उप-मद (3) में विनिर्दिष्ट रीति से अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में या भारत के बाहर निर्यात के अनुक्रम में उसके द्वारा विक्रय के लिए आशयित है; और
(ग) विक्रय या पुनः विक्रय के लिए आशयित ऐसे पात्रों या अन्य साम्रगी का विक्रय, जो तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट माल से भिन्न, ऐसे व्यौहारी के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट वर्ग या वर्गों के माल को पैक करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है;
(vi) ऐसे अन्य विक्रय जिन्हें धारा 66 के अधीन कर के संदाय से छूट दी गई है या जो विहित किए जाएं :
परन्तु उपखण्ड (iv) में निर्दिष्ट किसी विक्रय की बाबत कोई कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसे माल के बारे में जिसकी बाबत कटौती का दावा किया जाता है, यह साबित नहीं कर दिया जाता है कि वह व्यौहारी द्वारा अपने रजिस्ट्रीकरण की तारीख से बारह मास की अवधि के भीतर विक्रय किया गया था और ऐसी कटौती का दावा उस विवरणी में सम्मिलित नहीं किया जाता जो उक्त विक्रय की बाबत व्यौहारी द्वारा दी जानी अपेक्षित है :
परन्तु यह और कि उपखण्ड (v) में विनिर्दिष्ट किसी विक्रय की बाबत कोई कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि उस रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी द्वारा जिससे माल का विक्रय किया जाता है, विहित प्राधिकारी से प्राप्य विहित प्ररूप में सम्यक् रूप से भरी गई और हस्ताक्षरित तथा विहित विशिष्टियों से युक्त सही घोषणा विहित रीति से और विहित समय के भीतर उस व्यौहारी द्वारा नहीं दे दी जाती है जो माल का विक्रय करता है :
परन्तु यह और भी कि यदि कोई माल किसी रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी द्वारा उपखण्ड (v) में वर्णित प्रयोजनों में से किसी के लिए क्रय किया जाता है किन्तु उसके द्वारा उसका वैसे उपयोग नहीं किया जाता है तो ऐसे क्रय किए गए माल की कीमत की कटौती विक्रय व्यौहारी के आवर्त में से अनुज्ञात की जाएगी किन्तु वह क्रय व्यौहारी के कराधेय आवर्त में सम्मिलित की जाएगी; और
(ख) व्यौहारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन उस रूप में संगृहीत और, यथास्थिति, कैशमेमों या बिलों में अलग-अलग दर्शित कर की कटौती करने के पश्चात् बाकी बचता है ।
5. ऐसे बिन्दु विहित करने की प्रशासक की शक्ति जिन पर माल पर कर लगाया जा सकेगा-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं, वह विक्रय बिन्दु विनिर्दिष्ट कर सकेगा जिस पर किसी माल या वर्ग के माल पर कर लगाया जा सकेगा और ऐसी अधिसूचना जारी किए जाने पर, ऐसे किसी माल या किसी वर्ग के माल के सम्बन्ध में ऐसे विक्रय बिन्दुओं को जो इस प्रकार अधिसूचित विक्रय बिन्दु से भिन्न हों, इस अधिनियम के अधीन कर के संदाय से छूट दी जाएगी :
परन्तु ऐसी कोई छूट तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि उस रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी द्वारा जो माल का विक्रय करता है, विहित प्राधिकारी से प्राप्य विहित प्ररूप में सम्यक् रूप से भरी गई और हस्ताक्षरित तथा विहित विशिष्टियों से युक्त सही घोषणा विहित रीति से और विहित समय के भीतर उस व्यौहारी द्वारा नहीं दे दी जाती जो माल का क्रय करता है :
परन्तु यह और कि यदि प्रशासक की यह राय है कि ऐसा करना लोक हित में आवश्यक है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे निबन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी व्यौहारी या किसी वर्ग के व्यौहारियों को प्रथम परन्तुक के अधीन घोषणा से छूट दे सकेगा ।
6. सबूत का भार-यह साबित करने का भार कि व्यौहारी द्वारा किए गए किसी विक्रय की बाबत वह इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार नहीं है, उसी पर होगा ।
7. कर-मुक्त माल-(1) तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट माल के विक्रय पर उसमें उपवर्णित शर्तों और अपवादों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए इस अधिनियम के अधीन कोई कर संदेय नहीं होगा ।
(2) प्रशासक, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, तृतीय अनुसूची में, या तो भूतलक्षी रूप से या भविष्यलक्षी रूप से; परिवर्धन कर सकेगा या उसमें से लोप कर सकेगा या उसको अन्यथा संशोधित कर सकेगा और तब तृतीय अनुसूची तद्नुसार संशोधित हुई समझी जाएगी :
परन्तु यदि ऐसे संशोधन से किसी व्यौहारी के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो ऐसा कोई संशोधन भूतलक्षी रूप से नहीं किया जाएगा ।
8. कतिपय विक्रय और क्रय का कर के दायित्वाधीन न होना-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी माल के किसी विक्रय या क्रय पर कोई कर अधिरोपित करती है या किसी कर के अधिरोपण को प्राधिकृत करती है, यदि ऐसा विक्रय या क्रय-
(i) अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में; या
(ii) दिल्ली के बाहर; या
(iii) भारत के राज्यक्षेत्र में माल के आयात या उसके बाहर माल के निर्यात के अनुक्रम में,
होता है ।
स्पष्टीकरण-केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 3, धारा 4 और धारा 5 यह अवधारित करने के लिए लागू होंगी कि कोई विशिष्ट विक्रय या क्रय इस धारा के खण्ड (i), खण्ड (ii) या खण्ड (iii) में उपदर्शित रीति से हुआ है या नहीं ।
अध्याय 3
विक्रय कर प्राधिकारी और अपील अधिकरण
9. विक्रय कर प्राधिकारी-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए प्रशासक किसी व्यक्ति को विक्रय कर आयुक्त नियुक्त करेगा ।
(2) आयुक्त की इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निष्पादन में सहायता करने के लिए, प्रशासक उतने अपर विक्रय कर आयुक्तों, विक्रय कर अधिकारियों और ऐसे अन्य व्यक्तियों को ऐसे पदाभिधानों के साथ नियुक्त कर सकेगा जितने प्रशासक आवश्यक समझे ।
(3) आयुक्त की सम्पूर्ण दिल्ली पर अधिकारिता होगी और उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अन्य व्यक्तियों की ऐसे क्षेत्रों पर अधिकारिता होगी जो आयुक्त विनिर्दिष्ट करे ।
(4) आयुक्त और उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अन्य व्यक्ति ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और ऐसे कृत्यों का पालन करेंगे जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त की जाएं या अपेक्षित किए जाएं ।
10. आयुक्त की शक्तियों का प्रत्यायोजन-ऐसे निबन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, आयुक्त, लिखित आदेश द्वारा, धारा 9 की उपधारा (3) और धारा 52 की उपधारा (1) के अधीन शक्तियों के सिवाय इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों में से किसी शक्ति का प्रत्यायोजन धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति को कर सकेगा:
परन्तु धारा 41 की उपधारा (3) के खण्ड (i) से खण्ड (vi) तक के (जिनमें ये दोनों खण्ड सम्मिलित हैं) अधीन आयुक्त की शक्तियां विक्रय कर अधिकारी से निम्न पंक्ति के किसी व्यक्ति को प्रत्यायोजित नहीं की जाएंगी और धारा 49 की उपधारा (1) के अधीन शक्तियां धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अपर विक्रय कर आयुक्त से भिन्न किसी व्यक्ति को प्रत्यायोजित नहीं की जाएंगी ।
11. कार्यवाहियां अन्तरित करने की शक्ति-(1) आयुक्त, लिखित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों या किसी वर्ग की कार्यवाहियों को धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति से उस हैसियत में नियुक्त अन्य किसी व्यक्ति को अन्तरित कर सकेगा चाहे ऐसे अन्य व्यक्ति को उस क्षेत्र की बाबत अधिकारिता हो या नहीं जिससे ऐसी कार्यवाहियां या ऐसे वर्ग की कार्यवाहियां सम्बन्धित हैं और आयुक्त इसी प्रकार किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों को (जिनके अन्तर्गत इस धारा के अधीन पहले ही अन्तरित की जा चुकी कोई कार्यवाही भी है) किसी ऐसे व्यक्ति से स्वयं अपने को अन्तरित कर सकेगा ।
(2) वह व्यक्ति जिसे उपधारा (1) के अधीन कोई कार्यवाही अन्तरित की गई है उसका ऐसे निपटारा करने के लिए अग्रसर होगा मानो वह स्वयं उसके द्वारा शुरू की गई थी ।
(3) किसी कार्यवाही का अन्तरण किसी ऐसी सूचना का फिर से जारी किया जाना आवश्यक नहीं बनाएगा जो ऐसे अन्तरण के पूर्व, पहले ही जारी की जा चुकी है और वह व्यक्ति जिसे कार्यवाही अन्तरित की गई है, अपने विवेक के अनुसार उसे उस प्रक्रम से चालू रख सकेगा जिस प्रक्रम पर वह उस व्यक्ति द्वारा छोड़ी गई थी जिससे वह अन्तरित की गई थी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में जिसका नाम उसके अधीन जारी किए गए किसी आदेश में विनिर्दिष्ट है, कार्यवाही" से इस अधिनियम के अधीन किसी वर्ष की बाबत ऐसी सभी कार्यवाहियां अभिप्रेत हैं जो ऐसे आदेश की तारीख को लम्बित हों या जो ऐसी तारीख को या उसके पूर्व पूरी हो गई हों और इसके अन्तर्गत ऐसी कार्यवाहियां भी हैं जो किसी वर्ष की बाबत ऐसे आदेश की तारीख के पश्चात् प्रारम्भ की जाएं ।
12. राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता संबंधी विवाद-(1) कोई भी व्यक्ति धारा 9 के अधीन नियुक्त किसी ऐसे विक्रय कर प्राधिकारी की अधिकारिता को, जो अपील प्राधिकारी नहीं है; ऐसे विक्रय कर प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन जारी की गई किसी सूचना को उस व्यक्ति द्वारा प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन के अवसान के पश्चात् प्रश्नगत करने का हकदार नहीं होगा ।
(2) किसी ऐसे विक्रय कर प्राधिकारी की अधिकारिता के बारे में कोई आपत्ति संबंधित प्राधिकारी को पूर्वोक्त अवधि के भीतर एक ज्ञापन प्रस्तुत करके उठाई जा सकेगी जो उस प्रश्न को आयुक्त को निर्देशित करेगा और आयुक्त आपत्ति उठाने वाले व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् प्रश्न का अवधारण करते हुए आदेश करेगा और इस निमित्त उसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
13. अपील अधिकरण-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशीघ्र, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अपील अधिकरण को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए एक या अधिक सदस्यों का जो वह ठीक समझे, एक अपील अधिकरण गठित करेगी:
परन्तु जहां अपील अधिकरण में एक सदस्य है वहां वह सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जो कम से कम दस वर्ष तक सिविल न्यायिक पद धारण कर चुका है या जो कम से कम तीन वर्ष तक केन्द्रीय विधि सेवा का (जो श्रेणी तीन से नीचे वाली न हो) सदस्य रहा है या जो कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय करता रहा है और जहां अपील अधिकरण में एक से अधिक सदस्य हैं वहां ऐसा एक सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जो पूर्वोक्त रूप से अर्हित हो ।
(2) जहां अपील अधिकरण के सदस्यों की संख्या एक से अधिक है वहां केन्द्रीय सरकार उन सदस्यों में से एक सदस्य को अपील अधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त करेगी ।
(3) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अपील अधिकरण के सदस्य या सदस्यों की अर्हताएं और सेवा की अन्य शर्तें तथा वह अवधि जिसके लिए ऐसा सदस्य या ऐसे सदस्य पद धारण करेंगे, ऐसी होंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित की जाएं ।
(4) अपील अधिकरण की सदस्यता में कोई रिक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा यथासाध्य शीघ्रता से भरी जाएगी ।
(5) यदि अपील अधिकरण के सदस्यों की संख्या एक से अधिक है और सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद है तो उस प्रश्न का विनिश्चय, यदि कोई बहुमत है तो, बहुमत के अनुसार किया जाएगा किन्तु यदि सदस्यों के मत बराबर हैं तो अपील अधिकरण के अध्यक्ष का उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(6) केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के अधीन रहते हुए, अपील अधिकरण अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने और अपने कामकाज को निपटाने के प्रयोजन के लिए ऐसे विनियम बनाएगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों से संगत हों ।
(7) उपधारा (6) के अधीन बनाए गए विनियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे ।
(8) अपील अधिकरण को अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए वे सभी शक्तियां होंगी जो धारा 42 के अधीन आयुक्त में निहित हैं और अपील अधिकरण के समक्ष कोई भी कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और अपील अधिकरण को दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
अध्याय 4
रजिस्ट्रीकरण, संशोधन और रद्दकरण
14. रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई भी व्यौहारी, जब वह धारा 3 के अधीन कर देने का जिम्मेदार हो, व्यौहारी के रूप में कारबार तब तक नहीं चलाएगा जब तक कि वह रजिस्ट्रीकृत न हो गया हो और उसके पास रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र न हो ।
(2) प्रत्येक व्यौहारी जिसका रजिस्ट्रीकृत होना उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित है, रजिस्ट्रीकृत के लिए आवेदन ऐसे समय के भीतर, ऐसी रीति से और ऐसे प्राधिकारी को करेगा जो विहित किया जाए ।
(3) यदि उक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवेदन विधिव है तो वह ऐसे नियमों के अनुसार जो विहित किए जाएं, आवेदक को विहित अवधि के भीतर रजिस्टर करेगा और उसे विहित प्ररूप में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देगा जिसमें धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (v) के प्रयोजनों के लिए माल या वर्ग का माल विनिर्दिष्ट किया जाएगा:
परन्तु यदि उक्त प्राधिकारी की यह राय है कि आवेदन विधिवत नहीं है तो वह, उक्त अवधि के भीतर पारित आदेश द्वारा और उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, आवेदन को नामंजूर करेगा:
परन्तु यह और कि कोई ऐसा माल या ऐसे वर्ग का माल जिसकी बाबत प्रशासक द्वारा धारा 5 के अधीन विक्रय बिन्दु विनिर्दिष्ट किया गया है, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट नहीं किया जाएगा और जहां उस धारा के अधीन अधिसूचना किसी प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट किसी माल या किसी वर्ग के माल की बाबत किसी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के दिए जाने के पश्चात् जारी की जाती है वहां उक्त प्रमाणपत्र के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसे माल या ऐसे वर्ग के माल के निर्देशों का लोप करने के लिए संशोधित किया गया है ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस धारा की उपधारा (3) या धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट किए जाने वाले माल या किसी वर्ग के माल के अन्तर्गत धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (i) या उपखण्ड (ii) में निर्दिष्ट माल नहीं आएगा ।
15. स्वेच्छया रजिस्ट्रीकरण-(1) तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट एक या अधिक वर्गों के माल में अनन्यतः व्यौहार करने वाले व्यौहारी से भिन्न कोई ऐसा व्यौहारी जिसका किसी वर्ष के दौरान आवर्त पच्चीस हजार रुपए से अधिक है, इस बात के होते हुए भी कि वह धारा 3 के अधीन कर देने का जिम्मेदार न हो, इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर सकेगा ।
(2) धारा 14 की उपधारा (2), (3) और (4) के उपबन्ध, जहां तक हो सके, इस धारा के अधीन व्यौहारियों के रजिस्ट्रीकरण के संबंध में लागू होंगे ।
(3) प्रत्येक व्यौहारी जो इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत किया गया है, जब तक उसका रजिस्ट्रीकरण प्रवृत्त रहता है, इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार होगा ।
(4) इस धारा के अधीन किसी व्यौहारी का रजिस्ट्रीकरण ऐसी अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा जो तीन पूर्ण वर्षों से कम की नही होगी और वह तत्पश्चात् तब तक प्रवृत्त बना रहेगा जब तक कि उसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रद्द न कर दिया जाए ।
16. अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई व्यक्ति जिसका आशय प्रति वर्ष तीस हजार रुपए से अधिक मूल्य के माल का विनिर्माण करने के प्रयोजन के लिए दिल्ली में कारबार स्थापित करना है, इस बात के होते हुए भी कि उसके धारा 14 के अधीन रजिस्ट्रीकृत होने की अपेक्षा न की जाए, ऐसी रीति से और ऐसे प्राधिकारी को जो विहित किया जाए, अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर सकेगा ।
(2) यदि उक्त प्राधिकारी का ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, आवेदन करने वाले व्यक्ति के वास्तविक आशय के बारे में समाधान हो जाता है तो वह ऐसे निन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करे, ऐसी प्रतिभूति जो वह आवश्यक समझे, देने वाले व्यक्ति को अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दे सकेगा और ऐसे प्रमाणपत्र में धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (v) के प्रयोजनों के लिए माल या वर्ग का माल विनिर्दिष्ट करेगा ।
(3) प्रत्येक व्यक्ति जिसे इस धारा के अधीन अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है, जब तक ऐसा प्रमाणपत्र प्रवृत्त रहता है तब तक, इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार होगा ।
(4) इस धारा के अधीन दिया गया अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसी अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए ।
(5) उपधारा (1) के अधीन विहित प्राधिकारी विहित रीति से इस निमित्त आवेदन किए जाने पर और ऐसे निर्बन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करे अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट अवधि को समय-समय पर बढ़ा सकेगा ।
(6) धारा 18 के उपबन्ध, जहां तक हो सके, इस धारा की उपधारा (2) के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित प्रतिभूति के संबंध में लागू होंगे ।
(7) यदि कोई व्यक्ति जिसे इस धारा के अधीन अतन्तिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है, पर्याप्त हेतुक के बिना, ऐसे प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर कोई कारबार स्थापित करने में असफल रहेगा अथवा उन निबन्धनों या शर्तों में से किसी का अनुपालन करने में असफल रहेगा जिनके अधीन ऐसे प्रमाणपत्र दिया गया था तो वह कर की उस रकम के डेढ़ गुने के बराबर शास्ति का संदाय करने का दायी होगा जो तब संदेय होती जब वह इस धारा के अधीन इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत नहीं हुआ होता ।
17. विशेष रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई भी व्यौहारी, जब वह धारा 3 की उपधारा (5) के अधीन कर देने का जिम्मेदार है, व्यौहारी के रूप में कारबार तब तक नहीं चलाएगा जब तक कि उसने विशेष रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त न कर लिया हो ।
(2) प्रत्येक व्यौहारी जिसका उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत होना अपेक्षित है, रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन ऐसे समय के भीतर, ऐसी रीति से और ऐसे प्राधिकारी को करेगा जो विहित किया जाए ।
(3) यदि उक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवेदन विधिवत है तो वह ऐसे नियमों के अनुसार जो विहित किए जाएं, आवेदक को विहित प्ररूप में विशेष रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देगा:
परन्तु उक्त प्राधिकारी ऐसे किसी प्रमाणपत्र में धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (v) के प्रयोजनों के लिए माल या वर्ग का माल विनिर्दिष्ट नहीं करेगा ।
18. कतिपय वर्ग के व्यौहारियों से प्रतिभूति-(1) यदि आयुक्त को इस अधिनियम के अधीन संदेय कर, प्रशमन धन या अन्य शोध्य राशि की उचित वसूली के लिए या, यथास्थिति, धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के द्वितीय परन्तुक में या धारा 5 के प्रथम परन्तुक में निर्दिष्ट प्ररूपों की उचित अभिरक्षा और प्रयोग के लिए ऐसा करना आवश्यक प्रतीत होता है तो, वह उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, किसी व्यौहारी को धारा 14, धारा 15 या धारा 17 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देने की या किसी व्यौहारी को दिए गए ऐसे प्रमाणपत्र के प्रभावी बने रहने की शर्त के रूप में यह अपेक्षा अधिरोपित कर सकेगा कि ऐसा व्यौहारी विहित रीति से और ऐसे समय के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, पूर्वोक्त सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, ऐसी प्रतिभूति या ऐसी अतिरिक्त प्रतिभूति देगा जो विनिर्दिष्ट की जाए ।
(2) किसी भी व्यौहारी से उपधारा (1) के अधीन कोई प्रतिभूति या अतिरिक्त प्रतिभूति देने की अपेक्षा तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि उसे सुनवाई का अवसर न दे दिया जाए और प्रतिभूति या अतिरिक्त प्रतिभूति की वह रकम जिसके दिए जाने की अपेक्षा की जाए, उस वर्ष के लिए जिसमें ऐसी प्रतिभूति या अतिरिक्त प्रतिभूति के दिए जाने की अपेक्षा की गई है, -
(क) धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन कर देने के जिम्मेदार ऐसे व्यौहारी की दशा में, जिसने धारा 14 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के दिए जाने के लिए आवेदन किया है, ऐसी रकम होगी जिसे आयुक्त ऐसे व्यौहारी के कारबार के स्वरूप और आकार को ध्यान में रखते हुए ऐसे कर के संदाय के लिए अवधारित करे, जिसके लिए व्यौहारी इस अधिनियम के अधीन जिम्मेदार हो या हो जाए;
(ख) किसी ऐसी दशा में जिसमें उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्ररूपों की उचित अभिरक्षा और प्रयोग के लिए प्रतिभूति दी जानी है, आयुक्त द्वारा अवधारित कर की ऐसी रकम होगी जिसे ऐसे प्ररूपों को जारी करके व्यौहारी द्वारा बचा लिए जाने की सम्भावना है;
(ग) किसी अन्य दशा में व्यौहारी के कराधेय आवर्त पर आयुक्त के प्राक्कलन के अनुसार संदेय कर से अधिक नहीं होगी;
(3) यदि किसी व्यौहारी द्वारा दी गई प्रतिभूति या अतिरिक्त प्रतिभूति, प्रतिभू-बंधपत्र के रूप में है और प्रतिभू की मृत्य हो जाती है या वह दिवालिया हो जाता है तो वह व्यौहारी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देने वाले प्राधिकारी को, ऐसी घटना के घटित होने के तीस दिन के भीतर सूचित करेगा और ऐसी घटना के नब्बे दिन के भीतर नया प्रतिभू-बंधपत्र निष्पादित करेगा ।
(4) आयुक्त आदेश द्वारा अच्छे और पर्याप्त हेतुक से और व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, व्यौहारी द्वारा दी गई सम्पूर्ण प्रतिभूति या उसका कोई भाग समपहृत कर सकेगा ।
(5) यदि उपधारा (4) के अधीन आदेश के कारण, किसी व्यौहारी द्वारा दी गई प्रतिभूति पूर्णतः समपहृत हो जाती है या अपर्याप्त हो जाती है तो वह ऐसी रीति से और ऐसी अवधि के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, यथास्थिति, अपेक्षित रकम की नई प्रतिभूति देगा या कमी को पूरा करेगा ।
19. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का संशोधन-(1) आयुक्त, इस अधिनियम के अधीन दी गई या अन्यथा प्राप्त किसी जानकारी पर विचार करने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, किसी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को समय-समय पर संशोधित कर सकेगा ।
(2) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में उपधारा (1) के अधीन किया गया संशोधन-
(क) नाम, स्वामित्व या कारबार के स्थान में तब्दीली या कारबार के किसी नए स्थान के खोले जाने की दशा में, उस आकस्मिकता की तारीख से जिसकी वजह से संशोधन आवश्यक हुआ है चाहे उस निमित्त जानकारी धारा 40 के अधीन विहित समय के भीतर दी गई हो या नहीं;
(ख) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में किसी माल या वर्ग के माल के वर्णन में किसी परिवर्धन या उपान्तर की दशा में, यदि उस निमित्त जानकारी धारा 40 के अधीन विहित समय के भीतर दी जाती है तो आकस्मिकता की तारीख से और किसी अन्य दशा में, आयुक्त द्वारा ऐसे परिवर्धन या उपान्तर के लिए निवेदन की प्राप्ति की तारीख से;
(ग) किसी माल या वर्ग के माल के निकाल दिए जाने की दशा में, निकाल दिए जाने के आदेश की तारीख से,
प्रभावी होगा:
परन्तु आयुक्त, स्वप्ररेणा से किसी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में संशोधन करने के पूर्व, ऐसे संशोधन से प्रभावित व्यौहारियों को सुनवाई का उचित अवसर देगा:
परन्तु यह और कि यदि कारबार के स्वामित्व में तब्दीली के परिणामस्वरूप व्यौहारी की कर देने की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है तो रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का संशोधन उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको ऐसी तब्दीली के बारे में जानकारी धारा 40 के अधीन दी जाती है ।
(3) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के किसी संशोधन से इस अधिनियम के अधीन अधिरोपणीय कर या शास्ति के लिए अथवा किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन के लिए किसी दायित्व पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि यदि कोई रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी-
(क) अपने कारबार के नाम में तब्दीली करता है; या
(ख) कोई फर्म है और उस फर्म के विघटन के बिना उसके गठन में कोई तब्दीली होती है; या
(ग) किसी न्यास का न्यासी है और उसके न्यासियों में कोई तब्दीली होती है; या
(घ) किसी प्रतिपाल्य का संरक्षक है और संरक्षक में कोई तब्दीली होती है; या
(ङ) कोई हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है और ऐसे कुटुम्ब का कारबार, ऐसे भागीदारी कारबार के रूप में संपरिवर्तित हो जाता है जिसमें सभी या कोई सहदायिक उसके भागीदार के रूप में हो,
तो पूर्वोक्त परिस्थितियों में से किसी परिस्थिति के कारण ही, यथास्थिति, व्यौहारी या उस फर्म जिसने गठन में तब्दीली की है या नए न्यासियों या नए संरक्षक या ऐसे भागीदारी कारबार के भागीदारों के लिए, नए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करना आवश्यक नहीं होगा और धारा 40 द्वारा अपेक्षित रीति से जानकारी दिए जाने पर रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र संशोधित किया जाएगा ।
20. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का रद्द किया जाना-(1) यदि-
(क) कोई कारबार जिसकी बाबत किसी व्यौहारी को इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया है, बन्द कर दिया जाता है; या
(ख) किसी व्यौहारी द्वारा कारबार के अन्तरण की दशा में, अन्तरिती इस अधिनियम के अधीन पहले से ही रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र धारण करता है; या
(ग) कोई व्यौहारी इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार नहीं रह गया है,
तो आयुक्त, यथास्थिति, ऐसे व्यौहारी या अन्तरक का रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसी तारीख से जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, रद्द कर सकेगा:
परन्तु खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र, यथास्थिति, कारबार के बन्द या अन्तरित किए जाने की तारीख से और खण्ड (ग) में निर्दिष्ट दशा में, उस तारीख से जिसको व्यौहारी की कर देने की जिम्मेदारी समाप्त हो गई है, इस तथ्य के होते हुए भी अप्रवर्तनशील समझा जाएगा कि रद्दकरण के आदेश का पारण या रद्दकरण के बारे में व्यौहारी की विशिष्टियों का धारा 65 द्वारा यथा अपेक्षित राजपत्र में प्रकाशन पूर्वोक्त तारीख के पश्चात् हुआ है:
परन्तु यह और कि व्यौहारी अपने कारबार के बन्द किए जाने के संबंध में धारा 40 द्वारा यथा अपेक्षित जानकारी देने में असफल रहता है तो आयुक्त प्रमाणपत्र को किसी विनिर्दिष्ट तारीख से रद्द करने के पूर्व ऐसा करने के अपने आशय की सूचना व्यौहारी की जानकारी के लिए राजपत्र में प्रकाशित करेगा और आदेश पारित करने के पूर्व व्यौहारी की आपत्तियों की, यदि कोई हों, सुनवाई करेगा ।
(2) धारा 15 के अधीन रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी, उस धारा की उपधारा (4) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, आयुक्त को अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के रद्दकरण के लिए आवेदन किसी वर्ष की समाप्ति से छह मास पूर्व न कि उसके पश्चात् विहित रीति से कर सकेगा और आयुक्त, तब के सिवाय जब कि व्यौहारी धारा 3 के अधीन कर देने का जिम्मेदार हो, तद्नुसार रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को रद्द कर देगा और ऐसा रद्दकरण उस वर्ष के अन्त से प्रभावी होगा ।
(3) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, आयुक्त किसी भी समय, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके और व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, ऐसे व्यौहारी द्वारा धारित रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को ऐसी तारीख से जिसे आयुक्त इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे उस दशा में रद्द कर सकेगा जिसमें-
(क) व्यौहारी ऐसा कोई कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) जो इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों के अधीन उसके द्वारा शोध्य है, संदत्त करने में असफल रहा है; या
(ख) व्यौहारी धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (v) या धारा 5 के प्रयोजनों के लिए ऐसी घोषणा जिसके बारे में वह जानता है या उसके पास विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है, धारण करता है या स्वीकार करता है या देता है या दिलवाता है; या
(ग) ऐसा व्यौहारी जिससे धारा 18 के उपबन्धों के अधीन प्रतिभूति देने की अपेक्षा की गई है, ऐसी प्रतिभूति देने में असफल रहा है; या
(घ) व्यौहारी इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों का उल्लघंन करता है या उसने ऐसा उल्लंघन किया है; या
(ङ) व्यौहारी इस अधिनियम के अधीन या बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941(1941 का बंगाल अधिनियम 6) जैसा कि वह उस समय दिल्ली में प्रवृत्त हो, के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है; या
(च) अन्य कोई ऐसा कारण, जो आयुक्त की राय में ऐसे रद्दकरण के लिए समुचित आधार है ।
(4) (क) यदि उपधारा (3) के अधीन पारित रद्दकरण का आदेश इस अधिनियम के अधीन किसी अपील या अन्य कार्यवाही के परिणामस्वरूप अपास्त कर दिया जाता है तो व्यौहारी का रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्रत्यावर्तित कर दिया जाएगा और वह कर देने का ऐसे जिम्मेदार होगा मानो उसका प्रमाणपत्र रद्द नहीं किया गया हो ।
(ख) यदि कोई व्यौहारी, जिसका रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र खण्ड (क) के अधीन प्रत्यावर्तित कर दिया गया है, आयुक्त का यह समाधान कर देता है कि ऐसे व्यौहारी द्वारा उसको उसके रजिस्ट्रीकरण के अप्रवर्तनशील रहने की अवधि के दौरान किए गए माल के विक्रय पर ऐसे कर का संदाय कर दिया गया है जिसे यदि, ऐसे प्रमाणपत्र का रद्दकरण न हुआ होता तो, वह संदत्त नहीं करता तो ऐसे कर की रकम का ऐसी रीति से जो विहित की जाए, समायोजन या प्रतिदाय किया जाएगा ।
(5) प्रत्येक व्यौहारी जो अपने रजिस्ट्रीकरण के रद्दकरण के लिए आवेदन करता है, उसे दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अपने आवेदन के साथ अभ्यर्पित करेगा और प्रत्येक व्यौहारी जिसका रजिस्ट्रीकरण उसके आवेदन के आधार से भिन्न आधार पर रद्द किया जाता है, ऐसा रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र रद्दकरण के आदेश की उसके सूचना की तारीख से सात दिन के भीतर अभ्यर्पित करेगा ।
(6) यदि व्यौहारी उपधारा (5) में यथा उपबन्धित अपना रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभ्यर्पित करने में असफल रहेगा तो आयुक्त लिखित आदेश द्वारा और व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, यह निदेश दे सकेगा कि व्यौहारी व्यतिक्रम के प्रत्येक दिन के लिए पच्चीस रुपए से अनधिक राशि का शास्ति के रूप में संदाय करेगा ।
(7) किसी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का रद्दकरण किसी व्यक्ति की ऐसे रद्दकरण की तारीख के पूर्व की किसी अवधि के लिए शोध्य कर देने की जिम्मेदारी को प्रभावित नहीं करेगा, चाहे ऐसा कर रद्दकरण की तारीख के पूर्व निर्धारित किया जाता है किन्तु असंदत्त रह जाता है अथवा इस बात के होते हुए भी कि वह इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार नहीं है, तत्पश्चात् निर्धारित किया जाता है ।
(8) यदि इस अधिनियम के अधीन पारित किसी आदेश से यह पाया जाता है कि व्यौहारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत कोई व्यक्ति इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाना चाहिए था तो, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा व्यक्ति अपने रजिस्ट्रीकरण की तारीख से प्रारम्भ होने वाली और ऐसे आदेश की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि के लिए कर देने का ऐसे जिम्मेदार होगा मानो वह व्यौहारी हो ।
अध्याय 5
कर की विवरणी, निर्धारण, वसूली और प्रतिदाय
21. कर का कालिक संदाय और विवरणियों का फाइल किया जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन संदेय कर का इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से, ऐसे अन्तरालों पर जो विहित किए जाएं, संदाय किया जाएगा ।
(2) प्रत्येक रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी और प्रत्येक अन्य व्यौहारी जिससे आयुक्त द्वारा, विहित रीति से तामील की गई सूचना द्वारा, ऐसा करने के लिए अपेक्षा की जाए आवर्त की ऐसी विवरणियां ऐसी तारीखों तक और ऐसे प्राधिकारी को देगा जो विहित किया जाए ।
(3) प्रत्येक रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी जिससे उपधारा (2) के अधीन विवरणियां देने की अपेक्षा की जाती है, किसी सरकारी खजाने या भारतीय रिजर्व बैंक में अथवा ऐसी अन्य रीति से जो विहित की जाए, ऐसी विवरणी के अनुसार इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा शोध्य कर की पूरी रकम का संदाय करेगा और यदि ऐसा संदाय किसी सरकारी खजाने या भारतीय रिजर्व बैंक में किया जाता है तो वह विवरणी के साथ ऐसे खजाने या बैंक की रसीद देगा जिसमें ऐसी रकम का संदाय दर्शित हो ।
(4) यदि कोई रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी अपने द्वारा दी गई किसी विवरणी में कोई भूल या गलती पाता है तो वह विवरणी के दिए जाने के लिए विहित अन्तिम तारीख से ठीक अगले तीन मास की समाप्ति के पूर्व किसी समय संशोधित विवरणी देगा और यदि उस संशोधित विवरणी से यह दर्शित होता है कि मूल विवरणी में दर्शित शोध्य कर की रकम से अधिक रकम शोध्य है तो उसके साथ ऐसी रसीद दी जाएगी जिसमें यह दर्शित किया गया हो कि अतिरिक्त रकम का संदाय उपधारा (3) में उपबन्धित रीति से कर दिया गया है ।
(5) इस धारा के अधीन प्रत्येक विवरणी निम्नलिखित द्वारा हस्ताक्षरित और सत्यापित की जाएगी-
(क) किसी व्यष्टि की दशा में स्वयं व्यष्टि द्वारा और जहां व्यष्टि भारत से अनुपस्थित है वहां सम्बन्धित व्यष्टि द्वारा या उस निमित्त उसके द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी व्यष्टि द्वारा और जहां वह व्यष्टि अपने कार्यों की देखभाल करने में मानसिक रूप से असमर्थ है वहां उसके संरक्षक द्वारा या उसकी ओर से कार्य करने के लिए सक्षम किसी अन्य व्यक्ति द्वारा;
(ख) किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में कर्ता द्वारा और जहां कर्ता भारत से अनुपस्थित है या अपने कार्यों की देखभाल करने में मानसिक रूप से असमर्थ है वहां ऐसे कुटुम्ब के किसी अन्य वयस्क सदस्य द्वारा;
(ग) किसी कम्पनी या स्थानीय प्राधिकारी की दशा में उसके प्रधान अधिकारी द्वारा;
(घ) किसी फर्म की दशा में उसके किसी भागीदार द्वारा जो अवयस्क न हो;
(ङ) किसी अन्य संगम की दशा में संगम के किसी सदस्य या उसके प्रधान अधिकारी द्वारा; तथा
(च) किसी अन्य व्यक्ति की दशा में उस व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से कार्य करने के लिए सक्षम किसी व्यक्ति द्वारा ।
(6) इस धारा की उपधारा (5) और धारा 59 के प्रयोजनों के लिए, प्रधान अधिकारी" पद का वही अर्थ होगा जो उसका आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खण्ड (35) के अधीन है ।
22. केवल रजिस्ट्रीकृत व्यौहारियों द्वारा कर का संग्रहण किया जाना-(1) कोई भी व्यक्ति जो रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी नहीं है, दिल्ली में अपने द्वारा माल के किसी विक्रय की बाबत इस अधिनियम के अधीन कर के रूप में किसी रकम का संग्रहण नहीं करेगा और कोई भी रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी ऐसा कोई संग्रहण इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यौहारी जिसे आयुक्त ने धारा 29 के अधीन एकमुश्त संदाय करने की अनुज्ञा दे दी है, यदि माल का विक्रय उस अवधि के दौरान किया जाता है जिससे ऐसा एकमुश्त संदाय सम्बन्धित है तो, उस पर कर के रूप में किसी राशि का संग्रहण नहीं करेगा ।
23. निर्धारण-(1) रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी द्वारा शोध्य कर की रकम ऐसे प्रत्येक वर्ष के लिए जिसके दौरान वह कर देने का जिम्मेदार है, पृथक्तः निर्धारित की जाएगी:
परन्तु यदि ऐसा व्यौहारी किसी वर्ष की किसी अवधि के सम्बन्ध में विवरणी विहित तारीख तक देने में असफल रहता है तो आयुक्त, यदि वह ठीक समझे तो, ऐसे व्यौहारी द्वारा शोध्य कर ऐसे वर्ष की उस अवधि या किसी अन्य अवधि के लिए पृथक्तः निर्धारित कर सकेगा:
परन्तु यह और कि आयुक्त, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं और उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, किसी व्यौहारी द्वारा शोध्य कर किसी वर्ष के भाग के लिए निर्धारित कर सकेगा ।
(2) यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि किसी अवधि की बाबत दी गई विवरणियां सही और पूर्ण हैं तो वह व्यौहारी द्वारा शोध्य कर की रकम ऐसी विवरणियों के आधार पर निर्धारित करेगा ।
(3) (क) यदि आयुक्त का यह समाधान नहीं होता कि किसी अवधि की बाबत दी गई विवरणियां सही और पूर्ण हैं और वह यह आवश्यक समझता है कि व्यौहारी की उपस्थिति या अतिरिक्त साक्ष्य का पेश किया जाना अपेक्षित है तो वह ऐसे व्यौहारी पर विहित रीति से ऐसी सूचना की तामील करेगा जिसमें उससे अपेक्षा की गई हो कि वह उसमें विनिर्दिष्ट तारीख को और स्थान पर हाजिर हो और ऐसा सभी साक्ष्य जिस पर वह व्यौहारी अपनी विवरणियों के समर्थन में निर्भर करता है, पेश करे या पेश कराए अथवा ऐसा साक्ष्य पेश करे जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(ख) सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को अथवा उसके पश्चात् यथाशीघ्र, आयुक्त ऐसे सभी साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् जो पेश किया जाए, व्यौहारी द्वारा शोध्य कर की रकम निर्धारित करेगा ।
(4) यदि कोई व्यौहारी उपधारा (3) के अधीन जारी की गई किसी सूचना के निबन्धनों का अनुपालन करने में असफल रहता है तो आयुक्त उसके द्वारा शोध्य कर की रकम अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारित करेगा ।
(5) यदि कोई व्यौहारी किसी अवधि की बाबत विवरणियां विहित तारीख तक देने में असफल रहता है तो आयुक्त व्यौहारी को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, उसके द्वारा शोध्य कर की रकम, यदि कोई हो, अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारित करेगा ।
(6) यदि ऐसी जानकारी पर जो उसको प्राप्त हुई है, आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यौहारी ने जो किसी अवधि की बाबत इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार रहा है, यथास्थिति, धारा 14 या धारा 17 के अधीन अपने को रजिस्ट्रीकृत नहीं कराया है तो आयुक्त ऐसी अवधि और सभी पश्चात्वर्ती अवधियों की बाबत व्यौहारी द्वारा शोध्य कर की रकम अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार निर्धारित करने के लिए ऐसी रीति से कार्यवाही करेगा जो विहित की जाए और ऐसा निर्धारण करने में व्यौहारी को सुनवाई का उचित अवसर देगा तथा यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि व्यतिक्रम उचित हेतुक के बिना किया गया था तो वह यह निदेश दे सकेगा कि व्यौहारी, इस प्रकार निर्धारित कर की रकम के अतिरिक्त उस रकम के दुगुने से अनधिक राशि शास्ति के रूप में देगा ।
(7) कोई निर्धारण उस वर्ष के अन्त से जिसकी या जिसके भाग की बाबत कर निर्धारणीय है, चार वर्ष की समाप्ति के पश्चात् उपधारा (1) से (5) के उपबन्धों के अधीन, और छह वर्ष की समाप्ति के पश्चात् उपधारा (6) के उपबन्धों के अधीन नहीं किया जाएगा:
परन्तु यदि ऐसा निर्धारण किसी अपील या पुनरीक्षण प्राधिकारी के या किसी न्यायालय के किसी आदेश के परिणामस्वरूप और उसको प्रभावी करने के लिए किया जाता है तो, यथास्थिति, चार वर्ष या छह वर्ष की अवधि की गणना ऐसे आदेश की तारीख से की जाएगी और यह भी कि सूचना की तामील के लिए समय की परिसीमा के सम्बन्ध में धारा 24 की उपधारा (1) के उपबन्ध इस परन्तुक के अधीन किए गए निर्धारण के लिए लागू नहीं होंगे ।
(8) इस धारा के अधीन किए गए किसी निर्धारण से इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
24. निर्धारण से छूटा आवर्त-(1) जहां धारा 23 के अधीन किसी वर्ष या उसके भाग के लिए व्यौहारी का निर्धारण करने के पश्चात् आयुक्त के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी अवधि की बाबत किसी व्यौहारी का सम्पूर्ण आवर्त या उसका कोई भाग कर के निर्धारण से छूट गया है या कम निर्धारित हुआ है या ऐसी दर पर निर्धारित हुआ है जो उस दर से निम्नतर है जिस पर वह निर्धारणीय है या उसमें गलती से कोई कटौती की गई है वहां आयुक्त-
(क) उस दशा में जिसमें व्यौहारी ने ऐसे आवर्त की विशिष्टियां छिपा ली हैं या उन्हें पूर्णतः प्रकट करने में लोप किया है या असफल रहा है, निर्धारण के अन्तिम आदेश की तारीख से छह वर्ष के भीतर; और
(ख) किसी अन्य दशा में निर्धारण के अन्तिम आदेश की तारीख से चार वर्ष के भीतर,
व्यौहारी पर सूचना की तामील कर सकेगा और व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, ऐसे आवर्त की बाबत व्यौहारी द्वारा शोध्य कर की रकम अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार अवधारित करने के लिए कार्यवाही करेगा और इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक हो सके, तद्नुसार लागू होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, आयुक्त के समक्ष लेखा बहियों या अन्य साक्ष्य का पेश किया जाना जिससे कि आयुक्त द्वारा सम्यक् उद्यम से तात्त्विक साक्ष्य का पता लगाया जा सकता था, इस धारा के अर्थ में अनिवार्यतः प्रकटीकरण नहीं होगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निर्धारण, पुनःनिर्धारण या पुनःसंगणना का कोई आदेश निम्नलिखित में से जो भी पश्चात्वर्ती हो उसके पश्चात् नहीं किया जाएगा, अर्थात्-
(क) धारा 23 की उपधारा (7) में यथाविनिर्दिष्ट, यथास्थिति, चार वर्ष या छह वर्ष की समाप्ति; या
(ख) उपधारा (1) के अधीन सूचना की तामील की तारीख से एक वर्ष की समाप्ति ।
25. कर का संदाय और वसूली-(1) (क) जहां विवरणियां शोध्य कर के पूर्ण संदाय को दर्शित करने वाली रसीद के बिना दी गई हैं वहां शोध्य कर की रकम; और
(ख) धारा 23 या धारा 24 के अधीन किसी अवधि के लिए निर्धारित, पुनःनिर्धारित या पुनःसंगणित कर की ऐसी रकम जैसी कि वह उस रकम को, यदि कोई हो, घटाकर आए जो उक्त अवधि की बाबत व्यौहारी द्वारा पहले ही संदत्त कर दी गई हो,
किसी ऐसी शास्ति के सहित जो इस धारा, धारा 23 की उपधारा (6), धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के उपबन्धों में से किसी के अधीन संदत्त किए जाने के लिए निर्दिष्ट की जाए, उसके लिए जिम्मेदार व्यौहारी द्वारा या व्यक्ति द्वारा सरकारी खजाने या भारतीय रिजर्व बैंक में अथवा ऐसी अन्य रीति से जो विहित की जाए, आयुक्त द्वारा इस प्रयोजन के लिए जारी की गई मांग की सूचना की तामील की तारीख से तीस दिन के भीतर संदत्त की जाएगी :
परन्तु जहां आयुक्त के पास यह विश्वास करने का कारण है कि यदि पूर्वोक्त तीस दिन की पूरी अवधि अनुज्ञात की जाती है तो ऐसा करना राजस्व के लिए अहितकर होगा वहां वह निदेश दे सकेगा कि मांग की सूचना में विनिर्दिष्ट राशि ऐसी अवधि के भीतर संदत्त की जाएगी जो पूर्वोक्त तीस दिन की अवधि से कम ऐसी अवधि है जो उसके द्वारा उस सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियत तारीख की समाप्ति के पूर्व किए गए आवेदन पर, आयुक्त किसी विशिष्ट व्यौहारी या व्यक्ति की बाबत और उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, ऐसी शर्तों के अधीन जो वह मामले की परिस्थितियों में अधिरोपित करना ठीक समझे, संदाय के लिए समय को बढ़ा सकेगा या किस्तों द्वारा संदाय अनुज्ञात कर सकेगा या संदाय का रोक दिया जाना मंजूर कर सकेगा ।
(3) यदि कर और शास्ति की, यदि कोई हो, रकम, यथास्थिति, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट या उपधारा (2) के अधीन बढ़ाए गए समय के भीतर संदत्त नहीं की जाती है तो उसके लिए जिम्मेदार व्यौहारी या व्यक्ति को उस रकम की बाबत व्यतिक्रमी समझा जाएगा ।
(4) यदि उपधारा (2) के अधीन किस्तों द्वारा संदाय अनुज्ञात किया जाता है और ऐसे संदाय के लिए जिम्मेदार व्यौहारी या व्यक्ति उस उपधारा के अधीन नियत समय के भीतर किस्तों में से किसी किस्त का संदाय करने में व्यतिक्रम करता है तो पूर्वोक्त व्यौहारी या व्यक्ति उस समय बकाया सम्पूर्ण रकम की बाबत व्यतिक्रमी समझा जाएगा और अन्य किस्त या किस्तों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे उसी तारीख को देय हो गई थी जिसको उस किस्त का वास्तव में व्यतिक्रम हुआ था ।
(5) यदि कोई व्यौहारी या व्यक्ति कर और शास्ति का, यदि कोई हो, संदाय करने में व्यतिक्रम करता है या व्यक्तिक्रमी समझा जाता है तो वह पूर्वगामी उपधाराओं के अधीन संदेय बकाया रकम के अतिरिक्त ऐसी रकम का शास्ति के रूप में संदाय करने का दायी होगा जो चालू रहने वाले व्यतिक्रम की दशा में समय-समय पर बढ़ाई जा सकेगी किन्तु इस प्रकार की शास्ति की कुल रकम बकाया रकम से अधिक न हो:
परन्तु कोई ऐसी शास्ति उद्गृहीत करने के पूर्व व्यौहारी या व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
(6) जहां किसी अंतिम आदेश के परिणामस्वरूप कर और शास्ति की, यदि कोई हो, रकम में जिसके संदाय में हुए व्यतिक्रम की बाबत शास्ति उद्गृहीत की गई थी, पूर्णतः कमी कर दी गई है वहां उद्गृहीत शास्ति रद्द कर दी जाएगी और संदत्त शास्ति की रकम प्रतिदत्त कर दी जाएगी ।
(7) कर या शास्ति की कोई रकम जिसकी बाबत कोई व्यौहारी या व्यक्ति व्यतिक्रमी है या धारा 29 या धारा 54 के अधीन देय कोई प्रशमन धन जो असंदत्त रह जाता है, भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल किया जा सकेगा:
परन्तु जहां धारा 16 की उपधारा (2) या धारा 18 के अधीन किसी व्यौहारी द्वारा, प्रतिभू-बंधपत्र के रूप में प्रतिभूति से भिन्न, प्रतिभूति दी गई है, वहां आयुक्त, उसके लिए जो अच्छे और पर्याप्त कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, किसी कर या शास्ति की कोई रकम या प्रशमन धन जो यथापूर्वोक्त असंदत्त रह जाता है, या उसका भाग, उस सम्पूर्ण प्रतिभूति या उसके किसी भाग के समपहरण का आदेश देकर वसूल कर सकेगा ।
26. कतिपय वसूली कार्यवाहियों का जारी रहना-यदि इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी कर या शास्ति या किसी अन्य रकम की बाबत (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् सरकार को शोध्य राशि" कहा गया है) मांग की कोई सूचना किसी व्यौहारी पर तामील की जाती है और सरकार को शोध्य ऐसी राशि की बाबत कोई अपील या पुनरीक्षण आवेदन फाइल किया जाता है या अन्य कार्यवाही की जाती है तो, -
(क) जहां ऐसी अपील, पुनरीक्षण या अन्य कार्यवाही में सरकार को शोध्य ऐसी राशि में वृद्धि की जाती है वहां आयुक्त व्यौहारी पर मांग की दूसरी सूचना केवल उतनी रकम की बाबत तामील करेगा जितनी से सरकार को शोध्य ऐसी राशि में वृद्धि की जाती है और सरकार को शोध्य ऐसी राशि के सम्बन्ध में जो ऐसी अपील, पुनरीक्षण आवेदन या कार्यवाही का निपटारा होने से पूर्व तामील की गई मांग की सूचना के अन्तर्गत आती है, कोई वसूली कार्यवाहियां, मांग की कोई नई सूचना तामील किए बिना, उसी प्रक्रम से जारी रहेंगी जिस प्रक्रम पर ऐसी कार्यवाहियां ऐसे निपटारे के ठीक पूर्व थीं;
(ख) जहां ऐसी अपील, पुनरीक्षण या कार्यवाही में सरकार को शोध्य ऐसी राशि में कमी की जाती है वहां-
(i) आयुक्त के लिए यह आवश्यक नहीं होगा कि वह व्यौहारी पर मांग की नई सूचना तामील करे;
(ii) आयुक्त उसे और उस समुचित प्राधिकारी को जिसके यहां वसूली कार्यवाहियां लम्बित हैं, ऐसी कमी किए जाने की सूचना देना;
(iii) ऐसी अपील, पुनरीक्षण आवेदन या कार्यवाही के निपटारे के पूर्व उस पर तामील की गई मांग की सूचना के आधार पर शुरू की गई वसूली कार्यवाहियां ऐसे कम की गई रकम के सम्बन्ध में उसी प्रकम से जारी रहेंगी जिस प्रक्रम पर ऐसी कार्यवाहियां ऐसे निपटारे के ठीक पूर्व थीं ।
27. ब्याज-(1) यदि कोई व्यौहारी देय कर का संदाय करने में असफल रहता है, जैसा धारा 21 की उपधारा (3) द्वारा अपेक्षित है तो वह, देय कर के (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) अतिरिक्त, इस प्रकार देय रकम पर, उक्त धारा की उपधारा (2) के अधीन विवरणी दिए जाने की अंतिम तारीख के ठीक अगली तारीख से एक मास की अवधि तक एक प्रतिशत प्रतिमास की दर से और उसके पश्चात् जब तक वह ऐसा संदाय करने में व्यतिक्रम जारी रखता है या धारा 23 के अधीन निर्धारण पूरा होने की तारीख तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, डेढ़ प्रतिशत प्रतिमास की दर से साधारण ब्याज देने का जिम्मेदार होगा ।
(2) यदि कोई व्यौहारी या व्यक्ति कर का संदाय करने में व्यतिक्रम करता है या व्यतिक्रमी समझा जाता है तो वह, धारा 23 या धारा 24 के अधीन संदेय रकमों के अतिरिक्त, ऐसी रकम पर, ऐसे व्यतिक्रम की तारीख से एक मास की अवधि तक एक प्रतिशत प्रतिमास की दर से और उसके पश्चात् जब तक वह उक्त रकम का संदाय करने में व्यतिक्रम जारी रखता है, डेढ़ प्रतिशत प्रतिमास की दर से साधारण ब्याज देने का जिम्मेदार होगा ।
(3) जहां किसी अंतिम आदेश के परिणामस्वरूप देय कर की रकम (जिसके अन्तर्गत शास्ति भी है) या व्यतिक्रम की रकम में पूर्णतः कमी की जाती है वहां संदत्त ब्याज की रकम, यदि कोई हो, प्रतिदत्त कर दी जाएगी और यदि ऐसी रकम में कोई फेरफार किया जाता है तो देय ब्याज की संगणना तद्नुसार की जाएगी:
परन्तु जहां संदेय कर की किसी रकम में ऐसे किसी आदेश द्वारा वृद्धि की जाती है वहां उतनी रकम पर जितनी से कर में वृद्धि की जाती है, ब्याज आदेश की तारीख से तीन मास की अवधि की समाप्ति के पश्चात् संदेय होगा:
परन्तु यह और कि जहां किसी न्यायालय या प्राधिकारी के किसी आदेश द्वारा किसी रकम की वसूली रुकी रहती है और ऐसा आदेश तत्पश्चात् रद्द कर दिया जाता है वहां ब्याज ऐसी किसी अवधि के लिए भी संदेय होगा जिसके दौरान ऐसा आदेश प्रवर्तन में रहा था ।
(4) इस धारा के अधीन संदेय ब्याज इस अधिनियम के अधीन देय कर समझा जाएगा ।
28. वसूली का विशेष ढंग-(1) किसी विधि या संविदा में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, आयुक्त किसी समय या समय-समय पर लिखित सूचना द्वारा, जिसकी एक प्रति व्यौहारी को उसके अन्तिम ज्ञात पते पर भेजी जाएगी, -
(क) किसी ऐसे व्यक्ति से जिसके द्वारा किसी ऐसे व्यौहारी को जिस पर धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन सूचना की तामील की गई है, कोई धन की रकम शोध्य हो या शोध्य हो जाए, या
(ख) किसी ऐसे व्यक्ति से जो ऐसे व्यौहारी के लिए या उसके लेखे धन धारित करता हो या तत्पश्चात् धारित करे,
यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह आयुक्त को धन के शोध्य होते ही या धारित किए जाने पर या प्रथम वर्णित सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर (किन्तु धन के पूर्वोक्त रूप से शोध्य होने के पूर्व या धारित किए जाने के पूर्व नहीं) उतने धन का जितना व्यौहारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन कर की बकाया और शास्ति की बाबत शोध्य रकम का संदाय करने के लिए पर्याप्त है अथवा जब वह उस रकम के बराबर हो या उससे कम हो तब सम्पूर्ण धन का संदाय करे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति द्वारा व्यौहारी को शोध्य या उसके द्वारा व्यौहारी के लिए या उसके लेखे धारित धन की रकम आयुक्त द्वारा विधिपूर्णक विद्यमान ऐसे दावों की (यदि कोई हों) कटौती करने के पश्चात् संगणित की जाएगी जो ऐसे व्यौहारी द्वारा ऐसे व्यक्ति को संदेय के लिए शोध्य हुए हों ।
(2) आयुक्त किसी ऐसे सूचना को संशोधित या प्रतिसंहृत कर सकेगा या सूचना के अनुसरण में किसी संदाय के किए जाने के लिए समय बढ़ा सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन सूचना के अनुपालन में कोई संदाय करने वाले किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने व्यौहारी के प्राधिकार के अधीन संदाय किया है और आयुक्त द्वारा दी गई उसकी रसीद ऐसे व्यक्ति के दायित्व का उस रसीद में विनिर्दिष्ट रकम तक, अच्छा और पर्याप्त उन्मोचन होगी ।
(4) इस धारा में निर्दिष्ट सूचना की प्राप्ति के पश्चात् किसी व्यौहारी के प्रति किसी दायित्व का निर्वहन करने वाला कोई व्यक्ति उन्मोचित दायित्व की सीमा तक या कर और शास्ति के लिए व्यौहारी के दायित्व की सीमा तक, इनमें से जो भी कम हो, आयुक्त के प्रति वैयक्तिक रूप से जिम्मेदार होगा ।
(5) यदि कोई व्यक्ति जिसे इस धारा के अधीन कोई सूचना भेजी गई है, आयुक्त को समाधानप्रद रूप में यह साबित कर देता है कि मांगी गई राशि या उसका कोई भाग व्यौहारी को देय नहीं है या वह व्यौहारी के लिए या उसके लेखे कोई धन धारित नहीं करता है तो इस धारा की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि उसमें ऐसे व्यक्ति से आयुक्त को, यथास्थिति, कोई ऐसी राशि या उसका भाग संदत्त करने की अपेक्षा की गई है ।
(6) धन की कोई ऐसी रकम, जिसकी पूर्वोक्त व्यक्ति से आयुक्त को संदाय करने की अपेक्षा की गई है या जिसके लिए वह इस धारा के अधीन आयुक्त के प्रति वैयक्तिक रूप से जिम्मेदार है, यदि वह असंदत्त रह जाती है तो, राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।
(7) आयुक्त उस न्यायालय को, जिसकी अभिरक्षा में व्यौहारी का धन है, यह आवेदन कर सकेगा कि उस धन की कुल रकम है या यदि वह धन देय कर और शास्ति से, यदि कोई हो, अधिक है तो, उतनी रकम का उसे संदाय किया जाए जितनी उस कर और शास्ति के उन्मोचन के लिए पर्याप्त हो ।
29. कर का एकमुश्त संदाय-आयुक्त, ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, किसी व्यौहारी को इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उसके द्वारा संदेय कर की रकम के बदले में, विहित रीति से अवधारित एकमुश्त राशि, प्रशमन के रूप में देने के लिए अनुज्ञा दे सकेगा ।
30. प्रतिदाय-(1) यदि कोई व्यक्ति आयुक्त का यह समाधान कर देता है कि किसी वर्ष के लिए उसके द्वारा या उसकी ओर से संदत्त कर की रकम उस रकम से अधिक है जो उस वर्ष के लिए इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा संदेय है तो वह कोई ऐसा दावा किए जाने पर जो विहित प्ररूप में होगा और विहित रीति से सत्यापित किया जाएगा, आधिक्य के प्रतिदाय का, या तो नकद संदाय द्वारा अथवा अपने विकल्प पर किसी अन्य अवधि की बाबत देय कर और शास्ति की (यदि कोई हो) रकम में से ऐसे आधिक्य की कटौती द्वारा, हकदार होगा :
परन्तु आयुक्त सर्वप्रथम ऐसे आधिक्य का विनियोजन किसी ऐसी रकम की वसूली के प्रति करेगा जिसकी बाबत धारा 25 के अधीन सूचना जारी की गई है और तब अतिशेष का, यदि कोई हो, प्रतिदाय करेगा ।
स्पष्टीकरण-यदि कोई निर्धारण नहीं किया जाता है तो व्यौहारी द्वारा धारा 21 के अधीन संदत्त शोध्य कर इस अधिनियम के अधीन संदेय कर समझा जाएगा ।
(2) यदि मृत्यु, अशक्तता, दिवाला, समापन या किसी अन्य हेतुक से, कोई व्यक्ति अपने को देय किसी प्रतिदाय का दावा करने या उसे प्राप्त करने में असमर्थ है, तो, यथास्थिति, उसका विधिक प्रतिनिधि या न्यासी या संरक्षक या रिसीवर ऐसे व्यक्ति या उसकी सम्पदा के फायदे के लिए ऐसे प्रतिदाय का दावा करने या उसे प्राप्त करने का हकदार होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रतिदाय का कोई दावा तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक वह उस आदेश की, जिससे ऐसे प्रतिदाय का दावा उत्पन्न होता है, तारीख से बारह मास की अवधि के भीतर नहीं किया जाता है और आयुक्त, इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, ऐसी किसी रकम का जो व्यौहारी को देय हो जाती है, विहित रीति से प्रतिदाय करेगा:
परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर ऐसा दावा न किए जाने का पर्याप्त हेतुक था तो वह प्रतिदाय का दावा उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा किन्तु ऐसे अवसान से बारह मास के पश्चात् नहीं ।
(4) यदि इस अधिनियम के अधीन अपील या अन्य कार्यवाही में पारित किसी आदेश के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति को आयुक्त द्वारा प्रतिदत्त की जाने के लिए अपेक्षित रकम उसे उसके दावे की तारीख से नब्बे दिन के भीतर उपधारा (3) के अधीन इस प्रकार प्रतिदत्त नहीं की जाती है तो वह व्यक्ति ऐसी रकम पर नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति के ठीक अगली तारीख से एक मास की अवधि तक एक प्रतिशत प्रतिमास की दर से साधारण ब्याज और उसके पश्चात् जब तक ऐसा प्रतिदाय नहीं किया जाता है, डेढ़ प्रतिशत प्रतिमास की दर से साधारण ब्याज पाने का हकदार होगा ।
स्पष्टीकरण-यदि इस उपधारा में निर्दिष्ट अवधियों में से किसी अवधि के दौरान प्रतिदाय करने में हुआ विलम्ब पूर्णतः या भागतः दावा करने वाले व्यक्ति के कारण हुआ माना जा सकता है तो उस विलम्ब की अवधि जो उसके कारण हुआ माना जा सकता है, उस अवधि में से अपवर्जित कर दी जाएगी जिसके लिए ब्याज संदेय है ।
(5) यदि उपधारा (4) के अधीन ब्याज की संगणना के प्रयोजनों के लिए अपवर्जित की जाने वाली अवधि के बारे में कोई प्रश्न उठता है तो ऐसे प्रश्न का अवधारण आयुक्त द्वारा किया जाएगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।
(6) जहां कोई ऐसा आदेश, जिससे प्रतिदाय उद्भूत होता है, अपील या अतिरिक्त कार्यवाही का विषय है या जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अन्य कार्यवाही लम्बित है और आयुक्त की यह राय है कि प्रतिदाय मंजूर करने से राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना है वहां आयुक्त प्रतिदाय को इतने समय तक रोक रख सकेगा जितना आयुक्त अवधारित करे ।
(7) प्रतिदाय के किसी दावे में व्यौहारी किसी ऐसे निर्धारण का या विनिश्चित किए गए ऐसे अन्य विषय का सही होना जो अन्तिम और निश्चायक हो गया है, प्रश्नगत नहीं कर सकेगा और न उसके पुनरीक्षण की मांग करेगा तथा व्यौहारी ऐसे दावे पर, ऐसे कर के जो गलती से संदत्त किया गया है या अधिक संदत्त किया गया है, प्रतिदाय के सिवाय कोई राहत पाने का हकदार नहीं होगा ।
(8) ऐसे किसी घोषित माल के दिल्ली में विक्रय की बाबत, जिसका तत्पश्चात् अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में विक्रय किया जाता है, इस अधिनियम के अधीन उद्गृहीत और संगृहीत किसी कर की प्रतिपूर्ति उस व्यक्ति को जो अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में विक्रय करता है, ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए की जाएगी जो विहित की जाएं ।
स्पष्टीकरण-उपधारा (8) के प्रयोजनों के लिए, घोषित माल" से ऐसा माल अभिप्रेत है जिसका अन्तरराज्यिक व्यापार या वाणिज्य में विशेष महत्व का होना केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 14= द्वारा घोषित किया गया है ।
31. मुजरा-यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यौहारी को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देने में विहित अवधि से अधिक विलम्ब हुआ है और ऐसा विलम्ब पूर्णतः व्यौहारी की ओर से हुई किसी त्रुटि, लोप या उपेक्षा के कारण नहीं हुआ था तो ऐसे व्यौहारी को किए गए माल के विक्रय पर संदत्त कर की रकम, यदि कोई हो, जो तब संदेय नहीं होती जब यथापूर्वोक्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देने में विलम्ब न हुआ होता; इस अधिनियम के अधीन व्यौहारी द्वारा संदेय किसी रकम के प्रति समायोजित की जाएगी:
परन्तु-
(क) यदि व्यौहारी द्वारा इस प्रकार संदत्त कर की रकम इस अधिनियम के अधीन कोई रकम देने की उसकी जिम्मेदारी से अधिक है तो समायोजन ऐसी जिम्मेदारी की सीमा तक ही किया जाएगा और अतिशेष का व्यौहारी को प्रतिदाय कर दिया जाएगा; और
(ख) यदि इस अधिनियम के अधीन कोई रकम देने की कोई जिम्मेदारी नहीं है, तो संदत्त कर की कुल रकम का व्यौहारी को प्रतिदाय किया जाएगा:
परन्तु यह और कि व्यौहारी ऐसे माल की बाबत, जो उसको दिए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट नहीं है, ऐसे किसी समायोजन या प्रतिदाय के लिए हकदार नहीं होगा ।
(2) इस धारा के अधीन कर के समायोजन या प्रतिदाय के लिए कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक वह उस तारीख से तीन मास के भीतर नहीं किया जाता है जिस तारीख को व्यौहारी को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया जाता है ।
अध्याय 6
विशेष दशाओं में जिम्मेदारी
32. कारबार के अन्तरण की दशा में जिम्मेदारी-(1) यदि कोई व्यौहारी जो इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार है, विक्रय, दान, पट्टे, इजाजत या अनुज्ञप्ति द्वारा, भाड़े पर या किसी भी अन्य रीति से अपने कारबार का पूर्णतः या भागतः अन्तरण करता है तो वह व्यौहारी और ऐसा व्यक्ति जिसको इस प्रकार कारबार अन्तरित किया जाता है, ऐसे अन्तरण के समय तक उस व्यौहारी द्वारा शोध्य कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) संयुक्ततः और पृथक्तः देने के जिम्मेदार होंगे, चाहे ऐसा कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) ऐसे अन्तरण के पूर्व निर्धारित किया गया हो किन्तु असंदत्त रह गया हो या तत्पश्चात् निर्धारित किया जाए ।
(2) यदि उपधारा (1) में निर्दिष्ट कारबार का कोई अन्तरिती या पट्टेदार ऐसा कारबार या तो अपने नाम में या किसी अन्य व्यक्ति के नाम में चलाता है तो वह अपने द्वारा किए गए माल के विक्रय पर ऐसे अन्तरण की तारीख से कर देने का जिम्मेदार होगा और यदि वह विद्यमान व्यौहारी है तो वह अपने रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के संशोधन के लिए विहित समय के भीतर आवेदन करेगा ।
33. समापनाधीन कम्पनी की दशा में जिम्मेदारी-(1) प्रत्येक व्यक्ति, -
(क) जो किसी ऐसी कम्पनी का समापक है जिसका चाहे न्यायालय के आदेशों के अधीन या अन्यथा, परिसमापन किया जा रहा है; या
(ख) जो किसी कम्पनी की किन्हीं आस्तियों का रिसीवर नियुक्त किया गया है (जिसे इसमें इसके पश्चात् समापक" कहा गया है),
ऐसा समापक होने के तीस दिन के भीतर आयुक्त को उस हैसियत में अपनी नियुक्ति की सूचना देगा ।
(2) आयुक्त ऐसी जांच करने या ऐसी जानकारी मंगाने के पश्चात् जो वह ठीक समझे उस तारीख से, जिसको वह समापक की नियुक्ति की सूचना प्राप्त करता है, तीन मास के भीतर समापक को वह रकम अधिसूचित करेगा जो आयुक्त की राय में ऐसे किसी कर को (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) चुकाने के लिए पर्याप्त होगी, जो इस अधिनियम के अधीन कम्पनी द्वारा उस समय संदेय है या जिसका तत्पश्चात् संदेय होना सम्भाव्य है ।
(3) समापक कम्पनी की आस्तियों या अपने पास की सम्पत्ति में से किसी को तब तक विलग नहीं करेगा जब तक उसे उपधारा (2) के अधीन आयुक्त द्वारा अधिसूचित नहीं कर दिया जाता और इस प्रकार अधिसूचित किए जाने पर, समापक अधिसूचित रकम के बराबर रकम अलग रख देगा और जब तक वह ऐसी रकम को इस प्रकार अलग नहीं रख देता तब तक वह कम्पनी की आस्तियों या अपने पास की सम्पत्ति में से किसी को विलग नहीं करेगा:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी न्यायालय के किसी आदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के अधीन कम्पनी द्वारा संदेय कर और शास्ति के, यदि कोई हो, संदाय के प्रयोजन के लिए या ऐसे प्रतिभूत लेनदारों को जिनके ऋण, समापन की तारीख को सरकार को शोध्य ऋणों से संदाय की पूर्विकता के लिए विधि के अधीन हकदार हैं, कोई संदाय करने के लिए या कम्पनी के परिसमापन के ऐसे खर्चों और व्ययों को, जो आयुक्त की राय में उचित हैं, पूरा करने के लिए ऐसी आस्तियों या सम्पत्ति को विलग करने से समापक को विवर्जित नहीं करेगी ।
(4) यदि समापक उपधारा (1) के अनुसार सूचना देने में असफल रहता है या उपधारा (3) में यथा अपेक्षित रकम अलग रखने में असफल रहता है या कम्पनी की किन्हीं आस्तियों या अपने पास की सम्पत्ति को उस उपधारा के उपबन्धों के उल्लंघन में विलग करता है तो वह उस कर और शास्ति के, यदि कोई हो, संदाय के लिए वैयक्तिक रूप से जिम्मेदार होगा जिसे देने के लिए इस अधिनियम के अधीन कम्पनी जिम्मेदार होगी:
परन्तु यदि कम्पनी द्वारा संदेय किसी कर और शास्ति की रकम, यदि कोई हो, उपधारा (2) के अधीन अधिसूचित की जाती है तो इस उपधारा के अधीन समापक की वैयक्तिक जिम्मेदारी ऐसी रकम तक ही होगी ।
(5) जहां एक से अधिक समापक हैं वहां इस धारा के अधीन समापक से संलग्न बाध्यताएं और जिम्मेदारी संयुक्त और पृथक्तः सभी समापकों से संलग्न होंगी ।
(6) यदि किसी प्राइवेट कम्पनी का परिसमापन किया जाता है और उस कम्पनी पर किसी अवधि के लिए, चाहे उसके परिसमापन के पूर्व या उसके अनुक्रम में या उसके पश्चात् इस अधिनियम के अधीन निर्धारित किसी कर और शास्ति की, यदि कोई हो, वसूली नहीं की जा सकती तो ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो उस अवधि के दौरान, जिसके लिए कर शोध्य है, किसी भी समय उस प्राइवेट कम्पनी का निदेशक था ऐसे कर और शास्ति के, यदि कोई हो, संदाय के लिए संयुक्ततः और पृथक्तः जिम्मेदार होगा जब तक कि वह आयुक्त के समाधानपर्यन्त यह साबित नहीं कर देता कि ऐसी गैर वसूली कम्पनी के कार्यों के संबंध में उसकी ओर से हुई किसी घोर उपेक्षा, अपकरण या कर्तव्य भंग के फलस्वरूप हुई नहीं मानी जा सकती ।
(7) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी इस धारा के उपबन्ध प्रभावी होंगे ।
(8) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, कम्पनी" और प्राइवेट कम्पनी" पदों के वही अर्थ होंगे जो उनके कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 की उपधारा (1) के खण्ड (i) और (iii) के अधीन हैं ।
34. फर्म के भागीदारों की कर देने की जिम्मेदारी- जहां कोई फर्म इस अधिनियम के अधीन कोई कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) देने की जिम्मेदारी है वहां वह फर्म और उस फर्म का प्रत्येक भागीदार इसके प्रतिकूल किसी संविदा के होते हुए भी, ऐसे संदाय के लिए संयुक्ततः और पृथक्तः जिम्मेदार होगा:
परन्तु यदि ऐसा कोई भागीदार उस फर्म से निवृत्त हो जाता है तो वह अपने निवर्तन की तारीख आयुक्त को उस निमित्त लिखित सूचना द्वारा सूचित करेगा और वह अपने निवर्तन के समय असंदत्त रह गया कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) और अपने निवर्तन की तारीख तक शोध्य कोई कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) चाहे वह कर उस तारीख को अनिर्धारित हो, देने का जिम्मेदार होगा:
परन्तु यह और कि यदि कोई ऐसी सूचना ऐसे निवर्तन की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर नहीं दी जाती है तो प्रथम परन्तुक के अधीन भागीदार की जिम्मेदारी उस तारीख तक बनी रहेगी जिसको ऐसी सूचना आयुक्त को प्राप्त होती है ।
35. संरक्षकों, न्यासियों, आदि की जिम्मेदारी-जहां ऐसा कारबार, जिसकी बाबत इस अधिनियम के अधीन कर संदेय है, किसी अवयस्क या अन्य असमर्थ व्यक्ति की ओर से और ऐसे अवयस्क या अन्य असमर्थ व्यक्ति के फायदे के लिए उसके किसी संरक्षक, न्यासी या अभिकर्ता द्वारा चलाया जाता है या उसके भारसाधन में है वहां ऐसा कर (जिनके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है), यथास्थिति, उस संरक्षक, न्यासी या अभिकर्ता पर उसी रीति से और उसी विस्तार तक उद्गृहीत किया जाएगा और उससे वसूल किया जा सकेगा जैसे वह किसी ऐसे अवयस्क या अन्य असमर्थ व्यक्ति के पूर्ण वयस और स्वस्थचित्त होने तथा स्वयं कारबार चलाने की दशा में उस पर निर्धारित किया जाता और उससे वसूल किया जा सकता और इन अधिनियम के सभी उपबन्ध, जहां तक हो सके, तद्नुसार लागू होंगे ।
36. प्रतिपाल्य-अधिकरण आदि की जिम्मेदारी-जहां किसी ऐसे कारबार का, जिसकी बाबत इस अधिनियम के अधीन कर संदेय है, स्वामित्व रखने वाले किसी व्यौहारी की सम्पदा या सम्पदा का कोई भाग प्रतिपाल्य-अधिकरण, महाप्रशासक, शासकीय न्यासी या किसी न्यायालय के किसी आदेश द्वारा या उसके अधीन नियुक्त किसी रिसीवर या प्रबंधक के (जिसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो कारबार का वास्तव में प्रबंध करता है चाहे, उसका पदाभिधान कोई भी हो) नियंत्रण के अधीन है वहां ऐसा कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) उस प्रतिपाल्य-अधिकरण, महाप्रशासक, शासकीय न्यासी, रिसीवर या प्रबंधक पर उसी रीति से और उसी विस्तार तक उद्गृहीत किया जाएगा और उससे वसूल किया जा सकेगा जैसे वह ऐसे व्यौहारी के स्वयं कारबार चलाने की दशा में उस पर निर्धारित किया जाता और उससे वसूल किया जा सकता और इस अधिनियम के सभी उपबन्ध, जहां तक हो सके, तद्नुसार लागू होंगे ।
37. अन्य दशाओं में जिम्मेदारी-(1) जहां कोई व्यौहारी, कोई फर्म या व्यक्तियों का संगम या हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है और ऐसी फर्म, संगम या कुटुम्ब ने कारबार बन्द कर दिया है वहां-
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसी फर्म, संगम या कुटुम्ब द्वारा ऐसे बन्द किए जाने की तारीख तक संदेय कर इस प्रकार निर्धारित किया जाएगा मानो उसे ऐसे बन्द ही नहीं किया गया था; और
(ख) प्रत्येक व्यक्ति जो ऐसे बन्द किए जाने के समय ऐसी फर्म का भागीदार या ऐसे संगम या कुटुम्ब का सदस्य था, ऐसे बन्द किए जाने पर भी, ऐसी फर्म, संगम या कुटुम्ब पर निर्धारित कर तथा अधिरोपित और उसके द्वारा संदेय शास्ति के संदाय के लिए संयुक्ततः और पृथक्तः जिम्मेदार होगा, चाहे ऐसा कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) ऐसे बन्द किए जाने के पूर्व या पश्चात् निर्धारित किया गया हो और जैसा ऊपर वर्णित है उसके अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक हो सके, इस प्रकार लागू होंगे मानो प्रत्येक ऐसा व्यक्ति या भागीदार या सदस्य स्वयं व्यौहारी था :
परन्तु जहां ऐसा कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) देने के जिम्मेदार किसी फर्म के भागीदार की मृत्यु हो जाती है वहां उपधारा (4) के उपबंध, जहां तक हो सके, लागू होंगे ।
(2) जहां किसी फर्म या संगम के गठन में कोई तब्दीली हुई है वहां उस फर्म या संगम के, जैसा कि वह अपने पुनर्गठन के पूर्व विद्यमान था या उसके पश्चात् विद्यमान है, भागीदार या सदस्य, धारा 34 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसके पुनर्गठन के पूर्व किसी अवधि के लिए उस फर्म या संगम द्वारा शोध्य कर, जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है, संयुक्ततः और पृथक्तः देने के जिम्मेदार होंगे ।
(3) जहां व्यौहारी का, जो फर्म या व्यक्तियों का संगम है, विघटन हो जाता है या जहां व्यौहारी ने, जो हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब है, उसके द्वारा चलाए जाने वाले कारबार की बाबत विभाजन कर लिया है वहां उपधारा (1) के उपबन्ध, जहां तक हो सके, लागू होंगे और तद्नुसार उस उपधारा में बन्द किए जाने के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, विघटन या विभाजन के प्रति निर्देश है ।
(4) जहां इस अधिनियम के अधीन कर देने के जिम्मेदार किसी व्यौहारी की मुत्यृ हो जाती है वहां,-
(क) यदि उस व्यौहारी द्वारा चलाया जाने वाला कारबार उसकी मृत्यु के पश्चात्, उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चालू रखा जाता है तो, ऐसा विधिक प्रतिनिधि या अन्य व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन उस व्यौहारी द्वारा शोध्य कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) देने का जिम्मेदार होगा, चाहे ऐसा कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) उसकी मृत्यु के पूर्व निर्धारित किया गया हो किन्तु असंदत्त रह गया हो या उसकी मृत्यु के पश्चात् निर्धारित किया जाए;
(ख) यदि उस व्यौहारी द्वारा चलाया जाने वाला कारबार उसकी मृत्यु के पश्चात् बन्द कर दिया जाता है तो, उसका विधिक प्रतिनिधि मृतक की सम्पदा में से उस विस्तार तक जहां तक सम्पदा में से भार को चुकाया जा सकता है, इस अधिनियम के अधीन उस व्यौहारी द्वारा शोध्य कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) देने का जिम्मेदार होगा, चाहे ऐसा कर (जिसके अन्तर्गत कोई शास्ति भी है) उसकी मृत्यु के पूर्व निर्धारित किया गया हो किन्तु असंदत्त रह गया हो या उसकी मृत्यु के पश्चात् निर्धारित किया जाए,
और इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक हो सके, ऐसे विधिक प्रतिनिधि या अन्य व्यक्ति को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह स्वयं व्यौहारी हो ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा और धारा 40 के प्रयोजनों के लिए, विधिक प्रतिनिधि" का वही अर्थ है जो उसका सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 2 के खण्ड (11) में है ।
अध्याय 7
लेखे पेश करने और जानकारी देने की जिम्मेदारी
38. लेखे-(1) इस अधिनियम के अधीन कर देने का जिम्मेदार प्रत्येक व्यौहारी और प्रत्येक अन्य व्यौहारी जिस पर धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन विवरणियां देने के लिए सूचना की तामील की गई है, अपने द्वारा क्रय और विक्रय किए गए माल के मूल्य का सही लेखा अपने कारबार के स्थान पर रखेगा और यदि आयुक्त समझता है कि ऐसा लेखा पर्याप्त रूप से उतना स्पष्ट और बोधगम्य नहीं है कि उससे वह उस उपधारा में निर्दिष्ट विवरणियों की उचित जांच कर सके तो वह ऐसे व्यौहारी से लिखित सूचना द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसे लेखे (जिनके अनतर्गत क्रय-विक्रय के अभिलेख भी हैं) रखे जो उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) आयुक्त साधारणतया किसी वर्ग के रजिस्ट्रीकृत व्यौहारियों को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगा कि वे ऐसे लेख (जिनके अन्तर्गत क्रय-विक्रय के अभिलेख भी है) जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए रखे, जो विहित किए जाएं ।
39. विक्रय ज्ञापन-यदि कोई रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी-
(क) किसी अन्य रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी को माल का विक्रय करता है, या
(ख) अन्तर्राज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में विक्रय करता है, या
(ग) किसी अन्य व्यक्ति को किसी एक संव्यवहार में दस रुपए से अधिक मूल्य के किसी माल का विक्रय करता है,
तो वह क्रेता को एक बिल या कैशमेमो देगा जो उसके द्वारा या उसके सेवक, प्रबन्धक या अभिकर्ता द्वारा क्रमानुसार संख्यांकित, हस्ताक्षरित और दिनांकित होगा और उसमें उसका नाम और पता और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं, दर्शित होंगी और ऐसे बिल या कैशमेमो की जो सम्यक्तः हस्ताक्षरित और दिनांकित होगा, दूसरी प्रति या प्रतिलिपि रखेगा और उसे एक वर्ष के अन्त से कम से कम पांच वर्ष की अवधि के लिए परिरक्षित रखेगा जब तक कि उस वर्ष की बाबत कोई कार्यवाही लम्बित न हो और उस दशा में वह उन कार्यवाहियों के अन्तिम विनिश्चय तक परिरक्षित रखा जाएगा :
परन्तु यदि किसी माल या किसी वर्ग के माल अथवा किन्हीं व्यौहारियों या किसी वर्ग के व्यौहारियों की बाबत प्रशासक की यह राय है कि किसी अन्य व्यक्ति को किसी एक संव्यवहार में दस रुपए से अधिक मूल्य के माल के विक्रय के लिए कोई बिल या कैशमेमो देना सम्भव नहीं है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, -
(i) मूल्य में दस रुपए से अधिक उस रकम को, ऐसे बिल या कैशमेमो के दिए जाने की रकम के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकेगा;
(ii) ऐसे माल या ऐसे वर्ग के माल अथवा ऐसे व्यौहारियों या ऐसे वर्ग के व्यौहारियों को इस धारा के प्रवर्तन से छूट दे सकेगा ।
40. कारबार की तब्दीली के बारे में जानकारी का दिया जाना- यदि कोई व्यौहारी, जिसे धारा 21 की उपधारा (2) के उपबन्ध लागू होते हैं-
(क) अपने कारबार या अपने कारबार के किसी भाग या कारबार के किसी स्थान का विक्रय या अन्यथा व्ययन करता है या कारबार के स्वामित्व में कोई अन्य तब्दीली करता है या उसे उसके बारे में पता चलता है; या
(ख) अपना कारबार बन्द कर देता है या अपने कारबार का स्थान या भाण्डागार बदल देता है या कारबार का नया स्थान खोलता है; या
(ग) अपने कारबार के नाम या प्रकृति में कोई तब्दीली करता है या उस माल या माल के वर्ग में कोई तब्दीली करता है जिसमें वह अपना कारबार चलाता है और जो उसके रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट है; या
(घ) अपने कारबार के संबंध में भागीदारी कर लेता है या अन्य संगम बना लेता है,
तो वह, विहित समय के भीतर, विहित प्राधिकारी को तद्नुसार सूचित करेगा और यदि किसी ऐसे व्यौहारी की मृत्यु हो जाती है तो उसका विधिक प्रतिनिधि उक्त प्राधिकारी को उसी प्रकार सूचित करेगा ।
41. लेखे और दस्तावेजें पेश करना और उनका निरीक्षण तथा परिसर की तलाशी-(1) आयुक्त, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, किसी व्यौहारी से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह-
(क) उसके समक्ष ऐसी लेखा बहियां, रजिस्टर या दस्तावेजें पेश करे,
(ख) व्यौहारी के माल के स्टाक या उसके द्वारा माल के क्रय, विक्रय या परिदानों के बारे में ऐसी जानकारी या उसके कारबार के बारे में ऐसी अन्य जानकारी दे,
जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझी जाए ।
(2) (क) किसी व्यौहारी के माल के स्टाक या उसके द्वारा माल के क्रय, विक्रय और परिदानों से संबंधित सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और दस्तावेजें, और
(ख) किसी व्यौहारी के कारबार के किसी स्थान या भाण्डागार में रखा सभी माल,
सभी युक्तियुक्त समयों पर आयुक्त द्वारा निरीक्षण के लिए खुला रहेगा और आयुक्त उक्त लेखा बहियों, रजिस्टरों या दस्तावेजों की ऐसी नकलें या उद्धरण और पाए गए माल की ऐसी तालिका ले सकेगा या लिवा सकेगा जो उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक प्रतीत हों ।
(3) जहां आयुक्त को, अपने पास की जानकारी पर या अन्यथा, यह विश्वास करने के युक्तियुक्त आधार हों कि-
(क) कोई व्यक्ति जिसे इस अधिनियम के अधीन कोई सूचना, लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें पेश करने या पेश कराने के लिए जारी की गई थी, ऐसी सूचना द्वारा यथा अपेक्षित ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें पेश करने या पेश कराने में लोप करता है या असफल रहता है, या
(ख) कोई व्यक्ति, जिसे यथापूर्वोक्त सूचना जारी की गई है या जारी की जा सकती है, कोई ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें, जो बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल अधिनियम 6) जैसा कि वह दिल्ली में प्रवृत्त था, के अधीन या इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के लिए उपयोगी या, उससे सुसंगत होंगी, पेश नहीं करेगा या पेश नहीं कराएगा, या
(ग) किसी व्यौहारी की लेखा बहियां, रजिस्टर या दस्तावेजें नष्ट, विकृत, परिवर्तित, मिथ्याकृत की जा सकती हैं या छिपाई जा सकती हैं अथवा उस व्यौहारी द्वारा किए गए कोई विक्रय, बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941(1941 का बंगाल अधिनियम 6) जैसा कि वह दिल्ली में प्रवृत्त था, के अधीन या इस अधिनियम के अधीन शोध्य कर के संदाय का अपवंचन करने की या अपवंचन करने का प्रयास करने की दृष्टि से दबा दिए गए हैं या दबाए जा सकते हैं,
वहां आयुक्त या धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति, यदि वह आयुक्त द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत है तो, -
(i) किसी ऐसे भवन या स्थान में प्रवेश कर सकेगा और तलाशी ले सकेगा जहां उसको यह संदेह करने का कारण है कि ऐसी लेखा बहियां और अन्य दस्तावेजें या विक्रय आगम रखे हुए हैं;
(ii) खण्ड (i) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए किसी दरवाजे, बक्से, लाकर, तिजोरी, अलमारी या अन्य पात्र का ताला, उस दशा में जिसमें उसकी चाबियां उपलब्ध न हों, तोड़कर खोल सकेगा;
(iii) कोई ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें या माल की कोई तालिका, जो उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक प्रतीत हों, अभिगृहीत कर सकेगा;
(iv) किन्हीं लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों पर पहचान चिह्न लगा सकेगा अथवा उनसे उद्धरण या नकलें ले सकेगा या लिवा सकेगा;
(v) ऐसी तलाशी के परिणामस्वरूप पाए गए किसी ऐसे धन या माल को नोट कर सकेगा या उसकी कोई तालिका बना सकेगा;
(vi) यदि किसी कार्यालय, दुकान, गोदाम, बक्से, लाकर, तिजोरी, अलमारी या अन्य पात्र का स्वामी या उसका अधिभोग रखने या भारसाधन करने वाला व्यक्ति उस स्थान को छोड़ देता है या वह उपलब्ध नहीं है या खोलने की मांग किए जाने पर उसे खोलने में असफल रहता है या इंकार करता है तो परिसर को, जिसके अन्तर्गत ऐसा कार्यालय, दुकान, गोदाम, बक्सा, लाकर, तिजोरी, अलमारी या अन्य पात्र भी है, मोहरबन्द कर सकेगा ।
(4) आयुक्त उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं प्रयोजनों के लिए अपनी सहायता के लिए किसी पुलिस अधिकारी या किसी लोक सेवक की या दोनों की सेवाओं की अध्यपेक्षा कर सकेगा ।
(5) जहां आयुक्त किन्हीं लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों को अभिगृहीत करता है वहां वह, यथास्थिति, व्यौहारी को या उसकी ओर से उपस्थित व्यक्ति को उनकी रसीद देगा और उसे इस प्रकार दी गई रसीद की अभिस्वीकृति प्राप्त करेगा:
परन्तु यदि व्यौहारी या ऐसा व्यक्ति जिसकी अभिरक्षा में से लेखा बहियां या अन्य दस्तावेजें अभिगृहीत की जाती हैं, अभिस्वीकृति देने से इंकार करता है तो आयुक्त उस रसीद को परिसर में छोड़ सकेगा और इस तथ्य को अभिलिखित कर सकेगा:
परन्तु यह और कि व्यौहारी या पूर्वोक्त व्यक्ति ऐसी तलाशी लेने या अभिग्रहण करने या तालिका बनाने के सात दिन के भीतर ऐसी तलाशी, अभिग्रहण या तालिका के विरुद्ध आयुक्त के समक्ष आपत्ति फाइल कर सकेगा ।
(6) आयुक्त उपधारा (3) के अधीन अभिगृहीत लेखा बहियों, रजिस्टरों या दस्तावेजों को, उन वर्षों की बाबत जिनसे वे लेखा बहियां, रजिस्टर या दस्तावेजें सम्बद्ध हैं इस अधिनियम के अधीन सभी कार्यवाहियों के पूरे होने तक की न कि उसके पश्चात् की इतनी अवधि के लिए जितनी वह आवश्यक समझे, अपनी अभिरक्षा में रखेगा और तत्पश्चात् उन्हें उस व्यौहारी को या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को, जिसकी अभिरक्षा या शक्ति में से वे अभिगृहीत की गई थीं, वापस करेगा:
परन्तु आयुक्त यथापूर्वोक्त ऐसी लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों को वापस करने के पूर्व उन पर ऐसे पहचान चिह्न लगा सकेगा या लगवा सकेगा जो उसे आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु यह और कि लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों को वापस करने के पूर्व आयुक्त यह अपेक्षा कर सकेगा कि, यथास्थिति, व्यौहारी या व्यक्ति यह लिखित वचन देगा कि लेखा बहियां और अन्य दस्तावेजें जब कभी किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए अपेक्षा की जाए, पेश की जाएंगी ।
(7) इस धारा में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, इस धारा के अधीन ली गई प्रत्येक तलाशी या किया गया अभिग्रहण, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के ऐसे उपबन्धों के अनुसार किया जाएगा जो उस संहिता के अधीन तलाशियों या अभिग्रहणों से संबंधित हैं ।
(8) आयुक्त, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, -
(क) किसी व्यक्ति से जिसके अन्तर्गत बैंककारी कम्पनी, डाकघर या उसका अधिकारी भी है, ऐसी बातों या विषयों के बारे में जानकारी देने की या उसके द्वारा विनिर्दिष्ट रीति से सत्यापित लेखाओं और कामकाज के विवरण, ऐसी बातों या विषयों के बारे में ऐसी जानकारी देते हुए जो उसकी राय में इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए उपयोगी या सुसंगत होगी, देने की अपेक्षा कर सकेगा;
(ख) किसी व्यक्ति से-
(i) जो किसी व्यौहारी को या उसकी ओर से परिदान के लिए किसी माल का परिवहन करता है या उसे अभिरक्षा में रखता है, यथास्थिति, उस माल की बाबत उसके पास होनी संभाव्य कोई जानकारी देने की या उसका निरीक्षण करने के लिए अनुज्ञा देने की अपेक्षा कर सकेगा;
(ii) जो किसी व्यौहारी के कारबार से संबंधित किन्हीं लेखा बहियों, रजिस्टरों या दस्तावेजों को बनाए रखता है या अपने कब्जे में रखता है, ऐसी लेखा बहियां, रजिस्टर या दस्तावेजें निरीक्षण के लिए पेश करने की अपेक्षा कर सकेगा ।
42. शपथ पर साक्ष्य लेने, आदि की आयुक्त और अन्य प्राधिकारियों की शक्ति-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति को निम्नलिखित विषयों की बाबत वे सभी शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय किसी न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को हाजिर कराना और शपथ या प्रतिज्ञान पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) लेखाओं और दस्तावेजों को पेश करने के लिए विवश करना; और
(ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना,
और आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष इस अधिनियम के अधीन कोई कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।
(2) इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई प्राधिकारी इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में उसके समक्ष पेश की गई किन्हीं लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों को परिबद्ध कर सकेगा और उन्हें ऐसी अवधि के लिए जो वह ठीक समझे अपनी अभिरक्षा में प्रतिधारित कर सकेगा:
परन्तु आयुक्त की सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त व्यक्ति, उसके लिए आयुक्त का अनुमोदन प्राप्त किए बिना, -
(क) किन्हीं लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों को, ऐसा करने के अपने कारणों को अभिलिखित किए बिना, परिबद्ध नहीं करेगा; या
(ख) ऐसी किन्हीं बहियों या दस्तावेजों को तीस दिन से अधिक अवधि के लिए अपनी अभिरक्षा में प्रतिधारित नहीं करेगा ।
अध्याय 8
अपीलें, निदेश और पुनरीक्षण
43. अपीलें-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन पारित किसी आदेश से, जो धारा 44 में वर्णित आदेश नहीं है, व्यथित कोई व्यक्ति विहित प्राधिकारी को अपील कर सकेगा:
परन्तु यदि कोई आदेश, जो धारा 44 में वर्णित या धारा 47 के अधीन किया गया आदेश नहीं है, आयुक्त द्वारा पारित किया जाता है तो व्यथित व्यक्ति उसके विरुद्ध अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(2) आयुक्त या कोई व्यक्ति, जो विहित प्राधिकारी द्वारा अपील में पारित आदेश से व्यथित है, ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(3) धारा 62 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई भी अपील तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक वह उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, तामील की तारीख से साठ दिन के भीतर फाइल न कर दी जाए ।
(4) इस धारा के अधीन फाइल की गई प्रत्येक अपील विहित प्ररूप में होगी और विहित रीति से सत्यापित की जाएगी और आयुक्त से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा अपील अधिकरण को फाइल की गई अपील की दशा में उसके साथ पचास रुपए की फीस दी जाएगी ।
(5) शास्ति के सहित या उसके बिना निर्धारण के आदेश के विरुद्ध या शास्ति अधिरोपित करने वाले आदेश के विरुद्ध कोई भी अपील तब तक अपील प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक ऐसी अपील के साथ, यथास्थिति, शास्ति के संहिता या उसके बिना कर के संदाय या उस शास्ति के संदाय का जिसकी बाबत अपील की गई है, सन्तोषप्रद सबूत न हो:
परन्तु अपील प्राधिकारी, यदि वह ठीक समझे तो, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, ऐसे आदेश के विरुद्ध-
(क) यथास्थिति, कर और शास्ति के, यदि कोई हो, या शास्ति के संदाय के बिना, अपीलार्थी द्वारा विहित रीति से ऐसी रकम के लिए प्रतिभूति देने पर, जो वह निदिष्ट करे, या
(ख) कर या शास्ति की ऐसी रकम के लिए जो असंदत्त रह जाती है, प्रतिभूति के सहित या उसके बिना ऐसी लघुतर राशि के संदाय के सबूत पर, जो वह निदिष्ट करे,
अपील ग्रहण कर सकेगा:
परन्तु यह और कि कोई भी अपील तब तक अपील प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक उसका यह समाधान न हो जाए कि कर की उतनी रकम संदत्त कर दी गई है जितनी अपीलार्थी अपने द्वारा शोध्य होनी स्वीकार करे ।
(6) अपील प्राधिकारी, अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्-
(क) निर्धारण की (जिसके अन्तर्गत अधिरोपित कोई शास्ति भी है) पुष्टि कर सकेगा, उसमें कमी कर सकेगा, उसमें वृद्धि कर सकेगा या उसे बातिल कर सकेगा, या
(ख) निर्धारण को (जिसके अन्तर्गत अधिरोपित कोई शास्ति भी है) अपास्त कर सकेगा और ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् जो निदिष्ट की जाए, निर्धारण प्राधिकारी नए सिरे से निर्धारण करने के लिए निदेश दे सकेगा, या
(ग) ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(7) धारा 45 में यथा उपबन्धित के सिवाय, अपील अधिकरण द्वारा अपील पर पारित आदेश अन्तिम होगा ।
44. आदेश जिनकी अपील न हो सकेगी-कोई भी अपील और पुनरीक्षण के लिए कोई भी आवेदन निम्नलिखित के विरुद्ध नहीं किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम के अधीन जारी की गई सूचना जिसमें किसी व्यौहारी से निर्धारण के लिए अपेक्षा की गई हो या जिसमें किसी व्यौहारी से इस बात का हेतुक दर्शित करने के लिए कहा गया हो कि इस अधिनियम के अधीन अपराध के लिए उसे अभियोजित क्यों न किया जाए; या
(ख) लेखा बहियों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों के अभिग्रहण या प्रतिधारण से सम्बन्ध रखने वाला आदेश; या
(ग) इस अधिनियम के अधीन अभियोजन की मंजूरी देने वाला आदेश; या
(घ) इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के दौरान पारित अंतरिम आदेश ।
45. उच्च न्यायालय को मामले का कथन-(1) धारा 43 की उपधारा (6) के अधीन अपील अधिकरण द्वारा पारित आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर व्यौहारी या आयुक्त, लिखित आवेदन द्वारा जहां आवेदन किसी व्यौहारी द्वारा किया जाता है वहां ऐसे आवेदन द्वारा, जिसके साथ पचास रुपए की फीस दी जाएगी, अपील अधिकरण से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसे आदेश से उत्पन्न होने वाले विधि के प्रश्न को उच्च न्यायालय को निर्देशित करे और इस धारा के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अपील अधिकरण, ऐसे आवेदन की प्राप्ति के एक सौ बीस दिन के भीतर, मामले का कथन तैयार करेगा और उसे उच्च न्यायालय को निर्देशित करेगा :
परन्तु यदि अपील अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि व्यौहारी या आयुक्त इसमें इसके पूर्व विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर आवेदन पेश करने से पर्याप्त कारण से निवारित हो गया था तो उस आवेदन को ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर, जो तीस दिन से अधिक न हो, पेश करने की अनुज्ञा दे सकेगा ।
(2) यदि अपील अधिकरण ऐसे मामले का कथन करने से, जिसको करने की उससे अपेक्षा की गई है, इस आधार पर इंकार कर देता है कि कोई विधि का प्रश्न उत्पन्न नहीं हुआ है तो, यथास्थिति, व्यौहारी या आयुक्त, ऐसे इंकार की सूचना के तीस दिन के भीतर, अपने आवेदन को वापस ले सकेगा (और यदि वह ऐसा करता है तो संदत्त फीस वापस कर दी जाएगी) या ऐसे इंकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय को आवेदन कर सकेगा ।
(3) यदि उपधारा (2) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर, उच्च न्यायालय का अपील अधिकरण के विनिश्चय के सही होने के बारे में समाधान नहीं होता है तो वह अपील अधिकरण से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह मामले का कथन करे और उसे निर्देशित करे तथा ऐसी अध्यपेक्षा की प्राप्ति पर, अपील अधिकरण तद्नुसार मामले का कथन करेगा और उसे निर्देशित करेगा ।
(4) यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान नहीं होता है कि उसको निर्देशित मामले के कथन इतने पर्याप्त हैं कि वह उसके द्वारा उठाए गए प्रश्नों का अवधारण कर सके तो न्यायालय उस मामले को अपील अधिकरण को, उसमें ऐसे परिवर्धन या परिवर्तन करने के प्रयोजन के लिए जो वह उस निमित्त निदिष्ट करे, लौटा सकेगा ।
(5) उच्च न्यायालय ऐसे किसी मामले की सुनवाई करने के पश्चात्, उसमें उठाए गए विधि के प्रश्न का विनिश्चय करेगा और उस पर अपना निर्णय देगा जिसमें ऐसे आधार होंगे जिन पर ऐसा विनिश्चय आधारित है तथा अपील अधिकरण को ऐसे निर्णय की एक प्रति भेजेगा जिस पर न्यायालय की मुद्रा और रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर होंगे और अपील अधिकरण तद्नुसार मामले को निपटाएगा ।
(6) जहां इस धारा के अधीन कोई निर्देश उच्च न्यायालय को किया जाता है वहां खर्चे [जिनमें उपधारा (1) में निर्दिष्ट फीस सम्मिलित नहीं की जाएगीट न्यायालय के विवेकानुसार होंगे ।
(7) अपील अधिकरण के आदेश के अनुसार शोध्य कर और शास्ति की (यदि कोई हो) ऐसी रकम का संदाय जिसकी बाबत उपधारा (1) के अधीन आवेदन किया गया है, ऐसे आवेदन का या उसके परिणामस्वरूप किए गए किसी निर्देश का निपटारा होने तक नहीं रोका जाएगा किन्तु यदि ऐसे निर्देश के परिणामस्वरूप ऐसी रकम में कमी कर दी जाती है तो अधिक संदत्त कर धारा 30 के उपबन्धों के अनुसार वापस किया जाएगा ।
46. राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले आदेशों का पुनरीक्षण-आयुक्त इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही का अभिलेख मांग सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा और यदि वह समझता है कि किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा उसमें पारित कोई आदेश जो उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किया गया है, जहां तक कि उससे राजस्व के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, गलत है तो वह व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने या करवाने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो उस मामले की परिस्थितियों के अनुसार न्यायोचित हो और जिसके अन्तर्गत निर्धारण और अधिरोपित शास्ति में (यदि कोई हो) वृद्धि या उपान्तरण करने अथवा निर्धारण और अधिरोपित शास्ति को (यदि कोई हो) रद्द करने और नए निर्धारण का निदेश देने वाला आदेश भी है :
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई अन्तिम आदेश, उस आदेश की जिसका पुनरीक्षण चाहा गया है, तारीख से पांच वर्ष की समाप्ति के पूर्व किया जाएगा ।
47. अन्य आदेशों का पुनरीक्षण-(1) आयुक्त की सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा पारित ऐसे किसी आदेश की दशा में, जो ऐसे आदेश से भिन्न है जो धारा 44 में निर्दिष्ट है या जिसे धारा 46 लागू होती है, आयुक्त स्वप्रेरणा से या ऐसे नियमों के अनुसार जो विहित किए जाएं, फाइल किए गए आवेदन पर इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसी कार्यवाही का अभिलेख मांग सकेगा जिसमें कोई ऐसा आदेश पारित किया गया है और ऐसी जांच कर सकेगा या करवा सकेगा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो व्यौहारी पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश न हो और जो वह ठीक समझे :
परन्तु आयुक्त इस उपधारा के अधीन किसी आदेश का पुनरीक्षण उस दशा में नहीं करेगा जिसमें-
(क) उस आदेश के विरुद्ध कोई अपील धारा 43 के अधीन अपील प्राधिकारी के समक्ष लम्बित है; या
(ख) यदि ऐसी अपील हो सकती है तो वह समय जिसके भीतर वह फाइल की जा सकती है, समाप्त नहीं हुआ है; या
(ग) द्वितीय अपील की दशा में व्यौहारी ने अपील के अपने अधिकार का अधित्यजन नहीं किया है ।
(2) आयुक्त इस धारा के अधीन स्वप्रेरणा से किसी आदेश का पुनरीक्षण, उस आदेश की जिसका पुनरीक्षण चाहा गया है, तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं करेगा ।
(3) व्यौहारी द्वारा इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए आवेदन की दशा में, ऐसा आवेदन उस तारीख से जिसको प्रश्नगत आदेश की सूचना उसे दी गई थी या जिसको उसे अन्यथा उसका पता चला हो, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, दो वर्ष के भीतर किया जाएगा ।
48. भूल सुधार-(1) आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति अभिलेख से प्रकट किसी भूल को, यथास्थिति, आयुक्त द्वारा या उस व्यक्ति द्वारा पारित किसी आदेश की तारीख से दो वर्ष के भीतर किसी भी समय स्वप्रेरणा से सुधार सकेगा और ऐसी किसी भूल को जो ऐसे आदेश द्वारा प्रभावित किसी व्यक्ति द्वारा उसके ध्यान में लाई गई है, उतनी ही अवधि के भीतर सुधार सकेगा :
परन्तु यदि ऐसे किसी सुधार का परिणाम कर में वृद्धि करना या प्रतिदाय की रकम में कमी करना हो तो वह तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि, यथास्थिति, आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त व्यक्ति ने उस व्यक्ति को जिसका आदेश द्वारा प्रभावित होना सम्भव है, ऐसा करने के अपने आशय की सूचना न दे दी हो और ऐसे व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया हो ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्ध धारा 43 के अधीन अपील प्राधिकारी द्वारा किसी भूल को सुधारने के लिए वैसे ही लागू होंगे जैसे आयुक्त द्वारा किसी भूल को सुधारने के लिए लागू होते हैं ।
(3) जहां उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट आदेश से सम्बन्धित किसी कार्यवाही में, जो अपील या पुनरीक्षण के तौर पर हो, किसी विषय पर विचार और विनिश्चय किया गया है वहां ऐसा आादेश पारित करने वाला प्राधिकारी, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन उस आदेश को किसी ऐसे विषय के सम्बन्ध में संशोधित कर सकेगा जो उस विषय से भिन्न हैं जिस पर इस प्रकार विचार और विनिश्चय किया गया हो ।
(4) जहां किसी ऐसे सुधार का परिणाम कर या शास्ति की रकम में कमी करना हो वहां आयुक्त ऐसे व्यक्ति को शोध्य किसी रकम का विहित रीति से प्रतिदाय करेगा ।
(5) जहां किसी ऐसे सुधार का परिणाम कर या शास्ति की रकम में वृद्धि करना या प्रतिदाय की रकम में कमी करना हो वहां आयुक्त ऐसे व्यक्ति द्वारा शोध्य रकम अध्याय 5 में उपबन्धित रीति से वसूल करेगा ।
(6) पूर्वगामी उपधाराओं में यथा उपबन्धित के सिवाय और ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए जो विहित किए जाएं, धारा 9 के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा या अपील अधिकरण द्वारा इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन किए गए किसी निर्धारण या पारित किसी आदेश का पुनर्विलोकन, यथास्थिति, उस व्यक्ति द्वारा या अपील अधिकरण द्वारा, स्वप्रेरणा से उस निमित्त किए गए आवेदन पर, किया जा सकेगा ।
(7) उपधारा (6) के अधीन कोई ऐसा आदेश पारित किए जाने के पूर्व, जिससे किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना सम्भव है ऐसे व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
49. विवादग्रस्त प्रश्नों का अवधारण-(1) यदि कोई प्रश्न किसी न्यायालय के समक्ष कार्यवाही से अन्यथा या आयुक्त द्वारा धारा 23 या धारा 24 के अधीन किसी व्यौहारी का निर्धारण या पुनःनिर्धारण किए जाने के पूर्व इस बारे में उत्पन्न होता है कि क्या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कोई व्यक्ति, सोसाइटी, क्लब या संगम या कोई फर्म या किसी फर्म की कोई शाखा या विभाग व्यौहारी है; या
(ख) किसी माल के प्रति की गई कोई विशिष्ट बात, धारा 2 के खण्ड (ज) में दिए गए विनिर्माण" शब्द के अर्थ के भीतर माल के विनिर्माण की कोटि में आती है या उसका ऐसा परिणाम होता है; या
(ग) कोई संव्यवहार विक्रय है और यदि ऐसा है तो उसकी विक्रय कीमत क्या है; या
(घ) किसी विशिष्ट व्यौहारी से रजिस्ट्रीकृत होने की अपेक्षा की गई है; या
(ङ) किसी विशिष्ट विक्रय की बाबत कोई कर संदेय है और यदि कर संदेय है तो उसकी दर क्या है,
तो आयुक्त ऐसे प्रश्न का अवधारण करते हुए, ऐसी अवधि के भीतर जो विहित की जाए, आदेश कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-यदि आयुक्त द्वारा व्यौहारी पर, यथास्थिति, धारा 23 या धारा 24 के अधीन किसी सूचना की तामील कर दी जाती है तो, इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, आयुक्त के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने धारा 23 या धारा 24 के अधीन किसी व्यौहारी का निर्धारण या पुनःनिर्धारण प्रारम्भ कर दिया है ।
(2) आयुक्त यह निदेश दे सकेगा कि उस अवधारण के पूर्व किए गए किसी विक्रय की बाबत किसी व्यक्ति की इस अधिनियम के अधीन जिम्मेदारी पर उस अवधारण का प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(3) यदि ऐसा कोई प्रश्न इस अधिनियम के अधीन या बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल अधिनियम 6), जैसा कि वह उस समय दिल्ली में प्रवृत्त था, के अधीन पहले ही पारित किसी आदेश से उत्पन्न होता है तो कोई भी ऐसा प्रश्न इस धारा के अधीन अवधारण के लिए ग्रहण नहीं किया जाएगा । किन्तु ऐसा प्रश्न ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील में या उसके पुनरीक्षण के रूप में उठाया जा सकेगा ।
अध्याय 9
अपराध और शास्तियां
50. अपराध-(1) जो कोई-
(क) धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के द्वितीय परन्तुक के अधीन या धारा 5 के प्रथम परन्तुक के अधीन ऐसी कोई घोषणा धारण करेगा देगा, पेश करेगा या स्वीकार करेगा, जिसके बारे में वह जानता है या, उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है; या
(ख) धारा 14 की उपधारा (1) या धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन यथा अपेक्षित रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना व्यौहारी के रूप में कारबार चलाएगा;
(ग) रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी न होते हुए, माल क्रय करते समय यह व्यपदेशन करेगा कि वह रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी है; या
(घ) रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी होते हुए, कोई माल या किसी वर्ग का माल, जो उसके रजिस्ट्रीकृत प्रमाणपत्र के अन्तर्गत नहीं आता है, क्रय करते समय यह व्यपदेशन करेगा कि ऐसा माल या ऐसे वर्ग का माल ऐसे प्रमाणपत्र के अन्तर्गत आता है; या
(ङ) धारा 20 की उपधारा (5) के उपबन्धों का अनुपालन नहीं करेगा; या
(च) धारा 21 की उपधारा (2) द्वारा यथा अपेक्षित कोई विवरणी विहित तारीख तक नहीं देगा या मिथ्या विवरणी देगा; या
(छ) रजिस्ट्रीकृत व्यौहारी न होते हुए कर के रूप में किसी रकम का इस अधिनियम के अधीन संग्रहण करेगा या ऐसे कर का इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन विहित रीति से भिन्न रीति से संग्रहण करेगा; या
(ज) अपने द्वारा क्रय या विक्रय किए गए माल के मूल्य का सही लेखा, जो धारा 38 द्वारा अपेक्षित है, नहीं रखेगा या उस धारा में निर्दिष्ट किसी सूचना या अधिसूचना में विनिर्दिष्ट क्रय या विक्रय का कोई लेखा या अभिलेख, उस धारा के अधीन ऐसा करने की अपेक्षा किए जाने पर, नहीं रखेगा; या
(झ) धारा 39 के अधीन यथा अपेक्षित कैशमेमो या बिल नहीं देगा या देने में उपेक्षा करेगा; या
(ञ) जानते हुए गलत लेखे, रजिस्टर या दस्तावेज रखेगा या पेश करेगा अथवा जानते हुए गलत जानकारी देगा; या
(ट) धारा 40 द्वारा अपेक्षित कोई जानकारी देने में उपेक्षा करेगा; या
(ठ) धारा 41 के अधीन उससे की गई किन्हीं अपेक्षाओं का अनुपालन करने से इंकार करेगा; या
(ड) धारा 41 के अधीन निरीक्षण को निवारित करने की दृष्टि से अपने कारबार का स्थान बंद करेगा; या
(ढ) यथास्थिति, धारा 41 के अधीन निरीक्षण, तलाशी या अभिग्रहण करने वाले या धारा 64 के अधीन किन्हीं कृत्यों का पालन करने वाले किसी अधिकारी को बाधा पहुंचाएगा या निवारित करेगा; या
(ण) मालयान का स्वामी या भारसाधक व्यक्ति होते हुए धारा 64 की अपेक्षाओं में से किसी अपेक्षा का पालन करने में असफल रहेगा, उपेक्षा करेगा या इंकार करेगा; या
(त) खण्ड (क) से (ण) में विनिर्दिष्ट किसी अपराध के करने में किसी व्यक्ति की सहायता करेगा या उसे दुष्प्रेरित करेगा,
वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, और जहां कि अपराध चालू रहने वाला अपराध है वहां अपराध के चालू रहने की अवधि के दौरान प्रत्येक दिन के लिए दो सौ रुपए से अनधिक जुर्माने से, दंडनीय होगा:
परन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन वैसे ही तथ्यों की बाबत संस्थित नहीं किया जाएगा जिनकी बाबत धारा 20 की उपधारा (6), धारा 23 की उपधारा (6), धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के अधीन कोई शास्ति अधिरोपित की गई है:
परन्तु यह और कि यदि किसी व्यक्ति ने, यथास्थिति, धारा 14 की उपधारा (2) या धारा 17 की उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुसार इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किया है तो उस व्यक्ति के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि उसने खण्ड (ख) के अधीन कोई अपराध किया है ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी यह है कि यदि कोई व्यक्ति उस उपधारा के खण्ड (क) या खण्ड (च) या खण्ड (ञ) या खण्ड (ठ) या खण्ड (ड) या खंड (ण) के अधीन कोई अपराध करता है और न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा अपराध जानबूझकर किया गया है तो वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, और जहां कि अपराध चालू रहने वाला अपराध है वहां अपराध के चालू रहने की अवधि के दौरान प्रत्येक दिन के लिए तीन सौ रुपए से अनधिक जुर्माने से, दण्डनीय होगा ।
51. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा
(ख) फर्म से संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
52. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन किसी अपराध का संज्ञान आयुक्त की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं और महानगर मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई भी न्यायालय ऐसे अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन दण्डनीय सभी अपराध संज्ञेय और जमानतीय होंगे ।
53. अपराधों का अन्वेषण-(1) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, आयुक्त इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय सभी अपराधों या किसी अपराध का अन्वेषण करने के लिए, उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति को या तो साधारणतः या किसी विशिष्ट मामले या वर्ग के मामलों की बाबत प्राधिकृत कर सकेगा ।
(2) इस प्रकार प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति ऐसे अन्वेषण के संचालन में उन शक्तियों का प्रयोग करेगा जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) द्वारा किसी संज्ञेय अपराध के अन्वेषण के लिए किसी पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को प्रदत्त हैं ।
54. अपराधों का शमन-(1) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, आयुक्त किसी ऐसे व्यक्ति से जिसकी बाबत यह अभिकथन है कि उसने धारा 50 के अधीन या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन कोई अपराध किया है, ऐसे अपराध के बारे में ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध किन्हीं कार्यवाहियों के प्रारम्भ के पूर्व या उसके पश्चात् पांच हजार रुपए से अनधिक राशि या जहां ऐसा अपराध जिसके किए जाने का अभिकथन है, उस धारा के खण्ड (क), (ख), (ग), (घ) और (च) में से किसी खण्ड के अधीन है वहां उस कर की रकम के तीन गुने से अनधिक राशि जो तद्द्वारा बचा ली गई होती, इनमें से जो भी अधिक हो, ऐसे अपराध के शमन के रूप में स्वीकार कर सकेगा ।
(2) ऐसी राशि के पूर्ण संदाय पर जो उपधारा (1) के अधीन आयुक्त द्वारा अवधारित की जाए, -
(क) यथापूर्वोक्त व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही प्रारम्भ नहीं की जाएगी; और
(ख) यदि यथापूर्वोक्त व्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्यवाही पहले प्रारम्भ कर दी गई है तो ऐसी कार्यवाहियां अग्रसर नहीं कर जाएंगी ।
55. शास्ति का अधिरोपण-(1) यदि कोई व्यौहारी उचित हेतुक के बिना धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन यथा अपेक्षित कोई विवरणी विहित तारीख तक देने में या उस धारा की उपधारा (3) द्वारा यथा अपेक्षित विवरणी के अनुसार देय कर देने में असफल रहेगा तो आयुक्त व्यौहारी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् यह निदेश दे सकेगा कि व्यौहारी, संदेय कर की रकम के अतिरिक्त, उस रकम के दुगुने से अनधिक राशि शास्ति के रूप में देगा या जहां कोई कर संदेय नहीं है वहां दो हजार रुपए से अनधिक राशि देगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट शास्तियां आयुक्त द्वारा इस तथ्य के होते हुए भी अधिरोपित की जा सकेंगी कि निर्धारण कार्यवाहियां धारा 23 के अधीन व्यौहारी के विरुद्ध शुरू नहीं की गई हैं ।
56. विक्रयों के छिपाने या गलत विशिष्टियां देने या मिथ्या व्यपदेशन करने के लिए शास्ति-(1) यदि आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति का, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के दौरान, यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यौहारी ने अपने विक्रयों की विशिष्टियां छिपाई हैं या अपने विक्रयों की गलत विशिष्टियां दी हैं तो वह व्यौहारी को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् निदेश दे सकेगा कि व्यौहारी संदेय कर की रकम के अतिरिक्त, उस कर की रकम के जो तद्द्वारा बचा ली गई होती, ढाई गुने से अनधिक राशि शास्ति के रूप में देगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति धारा 50 के खण्ड (क) के अधीन कोई अपराध करेगा तो आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति, उस व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् लिखित आदेश द्वारा, उस कर की रकम के जो तद्द्वारा बचा ली गई होती, ढाई गुने से अनधिक राशि उस व्यक्ति पर शास्ति के रूप में अधिरोपित कर सकेगा ।
(3) यदि माल का क्रय करने वाला कोई व्यक्ति धारा 50 के खण्ड (ग) या खण्ड (घ) के अधीन कोई अपराध करेगा तो, यथास्थिति, वह प्राधिकारी जिसने उसको इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया है या जो उसको ऐसा प्रमाणपत्र देने के लिए सक्षम है, उसको सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् लिखित आदेश द्वारा उस कर के जो यदि अपराध न किया गया होता तो उसको किए गए माल के विक्रय की बाबत इस अधिनियम के अधीन उद्गृहीत किया जाता, ढाई गुने से अनधिक राशि उस पर शास्ति के रूप में अधिरोपित कर सकेगा ।
57. व्यौहारियों द्वारा कर के संग्रहण से संबंधित उपबंधों के उल्लंघन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति धारा 22 के उपबंधों के उल्लंघन में कार्य करेगा तो वह गलत तौर पर संगृहीत कर के ढाई गुने से अनधिक शास्ति से दण्डनीय होगा:
परन्तु आयुक्त ऐसी शास्ति तक तब अधिरोपित नहीं करेगा जब तक संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।
अध्याय 10
प्रकीर्ण
58. जब कुटुम्ब का विभाजन हो गया है या फर्म विघटित कर दी गई है तब सूचना की तामील-(1) जहां किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब का विभाजन हो गया है वहां इस अधिनियम के अधीन सूचनाओं की तामील उस व्यक्ति पर की जाएगी जो उस हिन्दू कुटुम्ब का अन्तिम कर्ता था या यदि ऐसा व्यक्ति मिल नहीं सकता है तो उन सभी वयस्कों पर तामील की जाएगी जो विभाजन के ठीक पूर्व उस हिन्दू कुटुम्ब के सदस्य थे ।
(2) जहां कोई फर्म या व्यक्तियों का संगम विघटित कर दिया जाता है वहां इस अधिनियम के अधीन सूचनाओं की तामील, किसी ऐसे व्यक्ति पर की जाएगी जो उसके विघटन से ठीक पूर्व, यथास्थिति, फर्म का भागीदार (जो अवयस्क न हो) था या संगम का सदस्य था ।
59. बन्द कर दिए गए कारबार की दशा में सूचना की तामील-जहां कोई निर्धारण ऐसे कारबार के सम्बन्ध में किया गया है जो बन्द कर दिया गया है वहां इस अधिनियम के अधीन सूचना की तामील, किसी फर्म या व्यक्तियों के संगम की दशा में किसी ऐसे व्यक्ति पर की जाएगी जो उसके बन्द कर दिए जाने के समय ऐसी फर्म या संगम का सदस्य था अथवा किसी कम्पनी की दशा में उसके प्रधान अधिकारी पर की जाएगी ।
60. कार्यवाहियों में किसी प्राधिकारी के समक्ष हाजिर होना-(1) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के सम्बन्ध में किसी प्राधिकारी के समक्ष हाजिर होने का हकदार है या जिससे ऐसी अपेक्षा की जाती है-
(क) इस निमित्त उसके द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत ऐसे व्यक्ति द्वारा हाजिर हो सकेगा जो उसका कोई नातेदार या उसके द्वारा नियमित रूप से नियोजित कोई व्यक्ति हो;
(ख) किसी ऐसे विधि-व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउन्टेंट द्वारा हाजिर हो सकेगा जो उपधारा (2) द्वारा या उसके अधीन निरर्हित न हो; या
(ग) किसी ऐसे विक्रय कर व्यवसायी द्वारा हाजिर हो सकेगा जिसके पास विहित अर्हताएं हों और जिसका नाम उस सूची में दर्ज हो जो आयुक्त उस निमित्त रखेगा और जो उपधारा (2) द्वारा या उसके अधीन निरर्हित न हो ।
(2) आयुक्त, लिखित आदेश द्वारा और उसके लिए जो कारण हैं उन्हें उसमें लेखबद्ध करके, किसी ऐसे विधि-व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउन्टेंट या विक्रय कर व्यवसायी को-
(i) जो सरकारी सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है; या
(ii) जो विधि-व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउन्टेंट होते हुए, उस वृत्ति के जिस वृत्ति का वह है, सदस्यों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही करने के लिए सशक्त प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के सम्बन्ध में अवचार का दोषी पाया जाता है; या
(iii) जो विक्रय कर व्यवसायी होते हुए, आयुक्त द्वारा ऐसे अवचार का दोषी पाया जाता है,
किसी ऐसे प्राधिकारी के समक्ष हाजिर होने से, ऐसी अवधि के लिए निरर्हित कर सकेगा जो आदेश में उल्लिखित की जाए ।
(3) किसी विशिष्ट व्यक्ति के बारे में निरर्हता का कोई भी आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उसको सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।
(4) कोई ऐसा व्यक्ति जिसके विरुद्ध इस धारा के अधीन निरर्हता का कोई आदेश किया जाता है, उस आदेश को रद्द कराने के लिए प्रशासक को अपील ऐसे आदेश की सूचना की तारीख से एक मास के भीतर कर सकेगा ।
(5) आयुक्त का आदेश उसके किए जाने से एक मास तक या यदि अपील की गई हो तो उस अपील का विनिश्चय होने तक प्रभावी नहीं होगा ।
(6) आयुक्त उपधारा (2) के अधीन किसी व्यक्ति के विरुद्ध किए गए किसी आदेश को किसी भी समय स्वप्रेरणा से या इस निमित्त उसको किए गए किसी आवेदन पर वापस ले सकेगा और तब ऐसा व्यक्ति निरर्हित नहीं रह जाएगा ।
61. किसी पद के धारक की तब्दीली-जब कभी इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के बारे में, आयुक्त या उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त व्यक्ति अधिकारिता का प्रयोग करने से परिविरत हो जाता है और उसका उत्तरवर्ती कोई दूसरा व्यक्ति होता है, जो अधिकारिता रखता है और उसका प्रयोग करता है, तब इस प्रकार उत्तरवर्ती होने वाला व्यक्ति कार्यवाही को उस प्रक्रम से जारी रख सकेगा जिस प्रक्रम पर वह कार्यवाही उसके पूर्वाधिकारी ने छोड़ी थी:
परन्तु सम्बन्धित व्यौहारी यह मांग कर सकेगा कि कार्यवाही को इस प्रकार जारी रखे जाने के पूर्व, पहले की कार्यवाही या उसके किसी भाग को पुनः आरम्भ किया जाए या उसके विरुद्ध कोई निर्धारण आदेश पारित करने के पूर्व उसकी पुनः सुनवाई की जाए ।
62. कतिपय मामलों में परिसीमा-काल का बढ़ाया जाना-(1) अपील प्राधिकारी धारा 43 के अधीन कोई अपील उस धारा में अधिकथित परिसीमा-काल के पश्चात् उस दशा में ग्रहण कर सकेगा जिसमें अपीलार्थी अपील प्राधिकारी का यह समाधान का देता है कि उसके पास ऐसी अवधि के भीतर अपील न करने का पर्याप्त हेतुक था ।
(2) धारा 43, 45, 46 और 47 के अधीन अधिकथित अवधि की संगणना करने में, परिसीमा अधिनियम, 1963(1963 का 36) की धारा 4 और धारा 12 के उपबन्ध, जहां तक हो सके, लागू होंगे ।
(3) धारा 43, 45, 46 या 47 से भिन्न इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी उपबन्ध द्वारा या उसके अधीन विहित परिसीमा-काल की संगणना करने में, कोई ऐसी अवधि अपवर्जित कर दी जाएगी जिसके दौरान कोई कार्यवाही किसी न्यायालय के किसी आदेश या व्यादेश द्वारा रोक दी जाती है ।
63. विवरणियों, आदि का गोपनीय होना-(1) इस अधिनियम के अनुसार किए गए किसी कथन, दी गई विवरणी या पेश किए गए लेखे या दस्तावेजों की या किसी दण्ड न्यायालय के समक्ष कार्यवाही से भिन्न इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के अनुक्रम में दिए गए साक्ष्य के किसी अभिलेख की सभी विशिष्टियां, उपधारा (3) में यथा उपबन्धि, गोपनीय मानी जाएंगी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय, यथापूर्वोक्त के सिवाय, किसी सरकारी सेवक से यह अपेक्षा करने का हकदार नहीं होगा कि वह उसके समक्ष ऐसा कोई कथन, विवरणी, लेखा, दस्तावेज या अभिलेख या उसका कोई भाग पेश करे या उसकी बाबत उसके समक्ष साक्ष्य दे ।
(2) यदि, उपधारा (3) में यथा उपबन्धित के सिवाय, कोई सरकारी सेवक उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई विशिष्टियां प्रकट करता है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी भागी होगा ।
(3) इस धारा की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम या भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन अन्वेषण या अभियोजन के प्रयोजनों के लिए उपधारा (1) में निर्दिष्ट किन्हीं विशिष्टियों का प्रकटीकरण; या
(ख) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी अधिकारी को ऐसे तथ्यों का प्रकटीकरण जो उन तथ्यों के सत्यापन के लिए या उस सरकार को उसके द्वारा कोई कर उद्गृहीत करने या अधिरोपित कर वसूल करने के लिए समर्थ बनाने के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हैं; या
(ग) ऐसी विशिष्टियों का प्रकटीकरण जहां ऐसा प्रकटीकरण किसी सूचना की तामील के लिए या किसी मांग की वसूली के लिए इस अधिनियम के अधीन किसी प्रक्रिया के विधिपूर्ण प्रयोग के कारण हुआ है; या
(घ) किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे वाद या कार्यवाही की किन्हीं ऐसी विशिष्टियों का प्रकटीकरण, जिनमें सरकार या कोई विक्रय कर प्राधिकारी पक्षकार है और जो इस अधिनियम के अधीन या तत्समय प्रवृत्त ऐसी किसी अन्य विधि के अधीन जो किसी विक्रय कर प्राधिकारी को उसके अधीन शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत करती है, किसी कार्यवाही से उत्पन्न होने वाले किसी विषय से संबंध रखती है; या
(ङ) किसी लोक सेवक द्वारा किन्हीं ऐसी विशिष्टियों का प्रकटीकरण जहां ऐसा प्रकटीकरण भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का 2) के अधीन अपर्याप्त रूप से स्टाम्पित दस्तावेज को परिबद्ध करने की उसकी शक्तियों के उसके द्वारा विधिपूर्ण प्रयोग के कारण हुआ है; या
(च) भारतीय रिजर्व बैंक को किन्हीं ऐसी विशिष्टियों का प्रकटीकरण जिनकी उस बैंक द्वारा अन्तरराष्ट्रीय विनिधान और भुगतान के संतुलन के वित्तीय आंकड़ों का संकलन करने के लिए उसे समर्थ बनाने के लिए अपेक्षा की जाए; या
(छ) कर की प्राप्तियों या प्रतिदायों की लेखापरीक्षा करने के प्रयोजन के लिए भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा नियुक्त किसी अधिकारी को किन्हीं ऐसी विशिष्टियों का प्रकटीकरण; या
(ज) किसी विधि-व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउन्टेंट के विरुद्ध आय-कर कार्यवाहियों के सम्बन्ध में अवचार के आरोप की किसी जांच से सुसंगत किन्हीं ऐसी विशिष्टियों का उस प्राधिकारी को प्रकटीकरण जो उस वृत्ति के जिस वृत्ति का वह है, सदस्यों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही करने के लिए सशक्त है; या
(झ) ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए जो प्रशासक साधारण या विशेष आदेश द्वारा निर्दिष्ट करे, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधिकारियों को ऐसी विशिष्टियों का प्रकटीकरण ।
64. चेकापोस्टों और नाकों का स्थापित किया जाना-(1) प्रशासक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर के और अन्य शोध्य राशि के जो इस अधिनियम के अधीन संदेय हो, अपवंचन को रोकने की दृष्टि से दिल्ली में किसी भी स्थान पर चेक-पोस्ट या नाके या दोनों स्थापित कर सकेगा ।
(2) माल-यान का स्वामी या उसका भारसाधक व्यक्ति अपने साथ, यथास्थिति, माल या अभिलेख, यात्रा या लागबुक और ऐसा विक्रयाधिकार पत्र या परिदान पत्र रखेगा, जिसमें ऐसी विशिष्टियां हों, जो माल यान में ले जाए जा रहे माल के बारे में विहित की जाएं और उसे ऐसी चेक-पोस्ट या नाके के किसी भारसाधक अधिकारी या ऐसे अन्य अधिकारी के समक्ष पेश करेगा जो प्रशासक द्वारा इस निमित्त सशक्त किया जाए ।
(3) दिल्ली में प्रवेश करने वाले या दिल्ली से बाहर जाने वाले किसी माल यान का स्वामी या उसका भारसाधक व्यक्ति ऐसी एक घोषणा जिसमें ऐसी विशिष्टियां हों, विहित प्ररूप में जो विहित प्राधिकारी से प्राप्य होगा, और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, चेक-पोस्ट या नाके के भारसाधक अधिकारी के समक्ष या पूर्वोक्त रूप से सशक्त अन्य अधिकारी के समक्ष फाइल करेगा:
परन्तु जहां माल यान का स्वामी या उसका भारसाधक व्यक्ति दिल्ली में प्रवेश करने के समय यह घोषणा फाइल करने के पश्चात् कि माल दिल्ली से बाहर किसी स्थान को ले जाने के लिए है, युक्तियुक्त हेतुक के बिना, ऐसे माल को विहित अवधि के भीतर दिल्ली से बाहर ले जाने में असफल रहेगा तो वह कर के, यदि कोई हो, संदाय के अतिरिक्त, उस कर के जो दिल्ली में उस माल के विक्रय किए जाने पर संदेय होता, ढाई गुने से अनधिक शास्ति से, या एक हजार रुपए से, इनमें से जो भी अधिक हो, दण्डनीय होगा ।
(4) प्रत्येक चेक-पोस्ट या नाके पर या किसी अन्य स्थान पर जब प्रशासक द्वारा इस निमित्त सशक्त किसी अधिकारी द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाए तब माल यान का चालक या उसका कोई अन्य भारसाधक व्यक्ति यान को रोकेगा और उसे स्थिर अवस्था में रोके रखेगा, जब तक चेक-पोस्ट या नाके के भारसाधक अधिकारी या पूर्वोक्त रूप से सशक्त अधिकारी द्वारा माल यान या उसके किसी भाग की तलाशी लेने के लिए, उसकी अन्तर्वस्तुओं की परीक्षा करने के लिए और ले जाए जा रहे माल से सम्बन्धित ऐसे सभी अभिलेखों का निरीक्षण करने के लिए अपेक्षा की जाए जो ऐसे चालक या अन्य भारसाधक व्यक्ति के कब्जे में हैं जो, यदि उससे ऐसी अपेक्षा की जाए तो, अपना नाम और पता तथा यान के स्वामी का नाम और पता और माल के प्रेषक और परेषिती के नाम और पते देगा ।
(5) यदि माल यान की अन्तर्वस्तुओं की परीक्षा करने पर या ले जाए जाने वाले माल से सम्बन्धित अभिलेख के निरीक्षण करने पर, प्रशासक द्वारा इस निमित्त सशक्त किसी अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐेसे माल यान का स्वामी या उसका भारसाधक व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन देय कर के संदाय का अपवंचन करने का प्रयत्न कर रहा है तो वह उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके और माल यान के स्वामी या उसके भारसाधक व्यक्ति की सुनावाई करने के पश्चात् माल को रोक सकता है और इस प्रकार रोके गए माल के परिवहन की अनुज्ञा तब तक नहीं दी जाएगी जब तक स्वामी या उसका अभिकर्ता या माल यान का भारसाधक व्यक्ति ऐसे अधिकारी को समाधानप्रद रूप में एक हजार रुपए से अनधिक रकम के लिए या उस कर की रकम के लिए जो तब संदेय होता जब उस माल का दिल्ली में विक्रय किया गया होता, इनमें से जो भी रकम अधिक हो, प्रतिभूति ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति से न दे दे जो विहित की जाए ।
(6) जहां उपधारा (5) के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित प्रतिभूति विहित अवधि के भीतर नहीं दी जाती है वहां उस माल का व्ययन ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए किया जाएगा जो विहित की जाएं ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, माल यान" के अन्तर्गत मोटरयान, जलयान, नाव, जीव-जन्तु और किसी अन्य प्रकार का प्रवहण भी है ।
65. ऐसे व्यौहारियों के नाम, आदि का प्रकाशन जिनके रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र रद्द कर दिए जाते हैं-आयुक्त, तीन मास से अनधिक के अन्तरालों पर, ऐसे व्यौहारियों की जिनके रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रद्द कर दिए जाते हैं, ऐसी विशिष्टियां जो विहित की जाएं, राजपत्र में प्रकाशित करेगा ।
66. छूट-(1) यदि प्रशासक की यह राय है कि ऐसा करना लोक हित में आवश्यक या समीचीन है तो वह, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए जो वह अधिरोपित करे, व्यौहारियों के किसी विनिर्दिष्ट वर्ग द्वारा किसी विनिर्दिष्ट वर्ग के विक्रयों को इस अधिनियम के अधीन संदेय संपूर्ण कर या उसके किसी भाग के संदाय से छूट दे सकेगा ।
(2) यदि किन्हीं ऐसे विक्रयों की बाबत, जिन्हें उपधारा (1) के अधीन कर के संदाय से छूट दी गई है, किसी ऐसे शर्त का भंग किया जाता है, जिसके अधीन रहते हुए ऐसी छूट दी गई थी तो ऐसे भंग के लिए जिम्मेदार व्यौहारी उन सभी विक्रयों की बाबत कर देने का इस प्रकार जिम्मेदार होगा मानो ऐसी कोई छूट नहीं दी गई थी ।
67. सिविल न्यायालयों में वादों का वर्जन-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन किए गए किसी निर्धारण या पारित किसी आदेश को अपास्त करने या उपान्तरित करने के लिए किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद नहीं लाया जाएगा और इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई अभियोजन, वाद या अन्य कार्यवाही सरकार के या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध न होगी ।
68. कार्यवाहियों के लम्बित रहने के दौरान अन्तरणों का शून्य होना-जहां इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान कोई व्यक्ति विक्रय, बंधक, दान या विनिमय अथवा किसी भी अन्य प्रकार के अन्तरण द्वारा किसी व्यक्ति के पक्ष में अपनी आस्तियों में से किसी पर भार का सृजन करता है या उसका कब्जा छोड़ देता है वहां ऐसा भार या अन्तरण उक्त कार्यवाहियों के पूरे होने के परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति द्वारा संदेय किसी कर या किसी अन्य राशि की बाबत किसी दावे के विरुद्ध शून्य होगा ।
69. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अध्याय 36 का कतिपय अपराधों को लागू न होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 36 की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी, अर्थात्: -
(i) इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध; या
(ii) कोई अन्य अपराध जिसका विचारण उस संहिता के उपबन्धों के अधीन किसी अन्य अपराध के साथ किया जाए,
और खण्ड (i) या खण्ड (ii) में निर्दिष्ट प्रत्येक अपराध का संज्ञान इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता रखने वाले न्यायालय द्वारा इस प्रकार किया जा सकेगा मानो उस अध्याय के उपबन्ध अधिनियमित नहीं किए गए थे ।
70. भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल किए जा सकने वाले विक्रय कर की वसूली के प्रयोजनों के लिए दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 के उपबन्धों का लागू होना-इस अधिनियम के अधीन भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूल की जा सकने वाली किसी रकम की वसूली के प्रयोजन के लिए दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 (1954 का दिल्ली 8) के ऐसे उपबन्ध जो भू-राजस्व के बकाया की वसूली के बारे में हैं, उस अधिनियम में या किसी अन्य अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी, सम्पूर्ण दिल्ली में प्रवृत्त समझे जाएंगे और राजस्व वसूली अधिनियम, 1908 (1908 का 1) के उपबन्ध तद्नुसार प्रभावी होंगे ।
71. नियम बनाने की शक्ति-(1) प्रशासक इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 3 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट तीन क्रमवर्ती वर्षों की समाप्ति की तारीख के पश्चात् ऐसी अतिरिक्त अवधि जिसके लिए व्यौहारी की कर देने की जिम्मेदारी बनी रहेगी;
(ख) यथास्थिति, धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (v) के अधीन या धारा 5 के अधीन घोषणा में अन्तर्विष्ट होने वाली विशिष्टियां, ऐसी घोषणा का प्ररूप, वह प्राधिकारी जिससे ऐसे प्ररूप प्राप्त किए जा सकेंगे और वह रीति जिससे और वह समय जिसके भीतर ऐसी घोषणा दी जानी है;
(ग) आवर्त की अवधि, वह रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन किसी माल के विक्रय के सम्बन्ध में आवर्त अवधारित किया जाएगा और वे विक्रय आवर्त जिनकी कटौती धारा 4 की उपधारा (2) के खण्ड (क) के उपखण्ड (vi) के अधीन की जा सकेगी;
(घ) वे निर्बन्धन और शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए आयुक्त धारा 10 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रत्यायोजन कर सकेगा;
(ङ) वह प्राधिकारी जिसको धारा 14, 15, 16 और 17 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किए जा सकेंगे और ऐसे आवेदनों का प्ररूप तथा उनकी बाबत संदेय फीस;
(च) व्यौहारियों के रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया और उससे आनुषंगिक अन्य बातें, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्रों का दिया जाना, वह अवधि जिसके भीतर ऐसे प्रमाणपत्र दिए जाएंगे तथा ऐसे प्रमाणपत्रों के प्ररूप;
(छ) वे अन्तराल जिन पर और वह रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन कर धारा 21 के अधीन संदेय होगा;
(ज) धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन दी जाने वाली विवरणियां और वे तारीखें जिन तक तथा वह प्राधिकारी जिसको ऐसी विवरणियां दी जाएंगी;
(झ) धारा 23 के अधीन निर्धारण के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(ञ) वे परिस्थितियां जिनमें और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए किसी व्यौहारी को धारा 29 के अधीन प्रशमन के रूप में एकमुश्त राशि देने के लिए अनुज्ञा दी जा सकेगी और ऐसी राशि का अवधारण करने की रीति;
(ट) वह प्ररूप जिसमें प्रतिदाय या मुजरा के दावे किए जा सकेंगे, वह रीति जिससे प्रतिदाय के लिए ऐसे दावे सत्यापित किए जाएंगे तथा जिसमें इस अधिनियम के अधीन प्रतिदाय या मुजरा अनुज्ञात किया जा सकेगा;
(ठ) वह प्राधिकारी जिसको धारा 40 के अधीन जानकारी दी जाएगी;
(ड) वे शर्तें जिनके अधीन लेखे या दस्तावेजें पेश किए जाने की अथवा जानकारी दिए जाने की धारा 41 की उपधारा (1) के अधीन अपेक्षा की जा सकेगी;
(ढ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे तथा वह प्राधिकारी जिसको निर्धारण के विरुद्ध अपीलें धारा 43 के अधीन फाइल की जा सकेगे, वह रीति जिससे ऐसी अपीलें सत्यापित की जाएंगी और उनकी बाबत संदेय फीस तथा ऐसे प्राधिकारी द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(ण) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 47 के अधीन पुनरीक्षण के लिए या धारा 48 की उपधारा (5) के अधीन पुनर्विलोकन के लिए आवेदन फाइल किए जा सकेंगे और उनकी बाबत संदेय फीस;
(त) वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए आयुक्त उसकी सहायता करने के लिए धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त व्यक्तियों को धारा 53 की उपधारा (1) के अधीन अपराधों का अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा;
(थ) वे शर्तें जिनके अधीन धारा 54 के अधीन अपराधों का शमन किया जा सकेगा;
(द) वह रीति जिससे और वह समय जिसके भीतर इस अधिनियम के अधीन आवेदन किए जाएंगे (जिनके अन्तर्गत उनकी बाबत संदेय फीस भी है), जानकारी दी जाएगी, प्रतिभूतियां दी जाएंगी और सूचनाओं की तामील की जाएगी:
(ध) कोई अन्य बात जो विहित की जानी अपेक्षित है या की जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों में यह उपबन्ध हो सकेगा कि उनका कोई उल्लंघन जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, और चालू रहने वाले उल्लंघन की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसे प्रथम उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसा उल्लंघन चालू रहता है, पच्चीस रुपए तक का हो सकेाग, दण्डनीय होगा ।
72. नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
73. निरसन और व्यावृत्ति-(1) दिल्ली में यथा प्रवृत्त बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल 6) (जिसे इसमें इसके पश्चात् उक्त अधिनियम कहा गया है) इसके द्वारा निरसित किया जाता है:
परन्तु ऐसे निरसन का उक्त अधिनियम के पूर्व प्रवर्तन पर या उसके अधीन पहले ही अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, हक, बाध्यता या जिम्मेदारी पर प्रभाव नहीं पड़ेगा और उसके अधीन रहते हुए यह है कि उक्त अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग करते हुए की गई कोई बात या कार्रवाई, जिसके अनतर्गत कोई नियुक्ति, अधिसूचना, सूचना, आदेश, नियम, प्ररूप या प्रमाणपत्र भी है, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए वैसे ही की गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम उस तारीख को प्रवृत्त था जिसको ऐसी बात या कार्रवाई की गई थी तथा इस अधिनियम के प्रारम्भ पर कर के सभी बकाया और अन्य देय रकमें इस प्रकार वसूल की जा सकेंगी मानो वे इस अधिनियम के अधीन प्रोद्भूत हुई हों ।
(2) बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट 1941 (1941 का बंगाल 6) जैसा कि वह दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त था, के अधीन आयुक्त के समक्ष उस तारीख के ठीक पूर्व जिस तारीख को धारा 13 के अधीन अपील अधिकरण गठित किया जाता है (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् अधिसूचित तारीख कहा गया है) पुनरीक्षण के लिए लंबित कोई आवेदन उस तारीख को अधिकरण को अन्तरित हो जाएगा और उसके द्वारा निपटाया जाएगा:
परन्तु यदि पुनरीक्षण के लिए आवेदन करने वाला अर्जीदार अपील अधिकरण को अपील करने के अपने अधिकार का अधिसूचित तारीख के पश्चात् पन्द्रह दिन के भीतर अधित्यजन कर देता है तो पुनरीक्षण के लिए कोई आवेदन अपील अधिकरण को अन्तरित नहीं किया जाएगा और उस दशा में पुनरीक्षण के लिए आवेदन आयुक्त द्वारा इस प्रकार निपटाया जाएगा मानो वह धारा 47 के अधीन किया गया पुनरीक्षण के लिए आवेदन हो ।
(3) पुनरीक्षण के लिए ऐसा कोई आवेदन जो अधिसूचित तारीख के ठीक पूर्व आयुक्त के समक्ष लंबित हो और जो उपधारा (2) के अधीन अपील अधिकरण को अन्तरित किया गया था, अपील अधिकरण द्वारा इस प्रकार निपटाया जाएगा मानो वह इस अधिनियम की धारा 43 के उपबन्धों के अधीन और उनके अनुसार अधिकरण को की गई अपील हो ।
(4) यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध कोई अपील अधिसूचित तारीख के पश्चात् अपील अधिकरण को की जाती है और इस अधिनियम के अधीन ऐसी अपील फाइल करने के लिए विनिर्दिष्ट परिसीमा-काल समाप्त नहीं हुआ है तो ऐसी अपील अधिसूचित तारीख के तीस दिन के भीतर या ऐसी अपील के फाइल किए जाने के लिए विनिर्दिष्ट परिसीमा-काल की समाप्ति के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, अधिकरण को हो सकेगी ।
74. कठिनाइयों का दूर किया जाना-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से एक वर्ष समाप्त होने के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह आदेश नहीं किया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु आदेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
75. संक्रमणकालीन उपबंध-जहां बंगाल फाइनेन्स (सेल्स टैक्स) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल 6) जैसा कि वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व दिल्ली में प्रवृत्त था, के अधीन कर देने का जिम्मेदार कोई व्यौहारी इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन कर देने का जिम्मेदार नहीं है वहां वह, प्रथम वर्णित अधिनियम के निरसन के होते हुए भी, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् अपने द्वारा किए गए ऐसे सभी माल के विक्रयों पर कर देने का जिम्मेदार बना रहेगा-
(i) जो ऐसे प्रारम्भ के पूर्व उसके द्वारा क्रय किया गया है,
(ii) जिसका ऐसे प्रारम्भ के पूर्व क्रय की गई कच्ची सामग्री से ऐसे प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् विनिर्माण किया गया है ।
प्रथम अनुसूची
[धारा 4 (1) (क) देखिए]
1. मोटर यान, जिनके अन्तर्गत मोटर यानों के चेसिस, मोटर टायर और ट्यूब, मोटर यानों के उपसाधन, संघटक पुर्जे और फालतू पुर्जे तथा मोटर बाडी भी हैं ।
2. मोटर साइकिल और मोटर और साइकिल संयोजक, मोटर स्कूटर, मोटरेट तथा टायर और ट्यूब तथा मोटर साइकिलों, मोटर स्कूटरों और मोटरेटों के उपसाधन, संघटक पुर्जे और फालतू पुर्जे ।
3. रेफ्रीजरेटर, वातानुकूलन और अन्य शीतलन साधित्र और उपकरण जिनके अन्तर्गत रूमकूलर और वाटरकूलर तथा उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे और उपसाधन भी हैं ।
4. बेतार अभिग्राही उपकरण और साधित्र, रेडियो और रेडियो ग्रामोफोन, दूरदर्शन सैट, संचायक, प्रवर्धक और लाउडस्पीकर तथा उनके फालतू पुर्जे, संघटक पुर्जे और उपसाधन तथा विद्युत् वाल्व ।
5. चलचित्रीय उपस्कर जिसके अन्तर्गत कैमरे, प्रक्षेपित्र तथा ध्वनि अभिलेखन और पुनरुत्पादी उपस्कर, तथा उसके साथ प्रयोग के लिए अपेक्षित फालतू पुर्जे, संघटक पुर्जे और उपसाधन तथा लैंस, फिल्में और सिनेमा कार्बन ।
6. फोटोचित्रण और अन्य कैमरे और विवर्धक, लैंस, फिल्में और प्लेटें, पेपर तथा उनके साथ प्रयोग के लिए अपेक्षित अन्य पुर्जे, फालतू पूर्जे और उपसाधन जिनके अन्तर्गत फोटोचित्रण रसायन और फोटोचित्र भी हैं किन्तु उनके अन्तर्गत ऐसा साधित्र और एक्सरे साधित्र के साथ प्रयोग के लिए अपेक्षित फिल्में, प्लेटें, फोटोचित्रण रसायन और अन्य उपस्कर तथा उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे और उपसाधन नही हैं ।
7. सभी दीवाल घड़ियां, टाइम पीस, घडियां, विघुत् समय स्विच और यांत्रिक समयांकक तथा उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे और उपसाधन ।
8. सभी आयुध जिनके अन्तर्गत राइफलें, रिवाल्वर, पिस्तौलें और उनके लिए गोलाबारूद तथा उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे और उपसाधन हैं ।
9. सिगरेट केस और लाइटर ।
10. डिक्टाफोन, टेपरेकार्डर और ध्वनि अभिलेखन के लिए इसी प्रकार के अन्य उपकरण और उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे तथा उपसाधन ।
11. ध्वनि प्रेषण उपस्कर जिसके अन्तर्गत टेलीफोन और लाउडस्पीकर और उनके संघटक पुर्जे, फालतू पूर्जे तथा उपसाधन हैं किन्तु उसके अन्तर्गत शरीर पर धारण किया जाने वाला और श्रवण सहाय के रूप में प्रयोग के लिए लगाया गया ध्वनि प्रवर्धक उपकरण नहीं है ।
12. टाइपराइटर, सारणीयन, परिकलन, रोकड़, पंजीयन, सूचकांक, कार्डछिद्रण, अंकन और पतालेखन मशीनें, टेलीप्रिंटर और अनुलिपित्र और उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे और उपसाधन ।
13. बाइनोक्यूलर, टेलीस्कोप तथा नाट्य दूरबीन और उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे और उपसाधन ।
14. ग्रामोफोन, रेकार्ड प्लेयर, रेकार्ड परिवर्तित और उनके संघटक पुर्जे, फालतू पुर्जे, उपसाधन तथा रेकार्ड और सुइयां ।
15. टार्च, टार्चसेल और तन्तु प्रकाश बल्बों से भिन्न सभी इलैक्ट्रोनिक और विद्युत वस्तुएं ।
16. टेबल कटलरी जिनके अन्तर्गत छुरी और कांटे हैं किन्तु उनके अन्तर्गत चम्मच नहीं हैं ।
17. सभी प्रकार की स्वच्छता की वस्तुएं और फिटिंग ।
18. (i) कांच की बनी सभी वस्तुएं किन्तु उनके अन्तर्गत विशद कांच पट्ट, आप्टिकल लैन्स, हरीकेन लालटेन की चिमनी, छोटी शीशियां, क्लिनिकल सिरिन्ज, थर्मामीटर, चूड़ियां और कांच के बने वैज्ञानिक साधित्र और उपकरण नहीं हैं;
(ii) चमकदार मिट्टी के बर्तन;
(iii) चीनी मिट्टी के बर्तन जिनके अन्तर्गत क्राकरी भी है ।
19. सभी प्रकार के निर्वात फ्लास्क (जिनके अन्तर्गत खाना या पेय को गरम या ठंडा रखने के लिए थर्मस, थर्मिक जग, आइस बकेट या बक्स, मर्तबान और अन्य घरेलू पात्र भी हैं) और उनके रिफिल ।
20. मदिरा (विदेशी मदिरा और भारत में बनी विदेशी मदिरा) ।
21. पिकनिक सैट जिसका एकल यूनिट के रूप में विक्रय किया जाए ।
22. लोहे और इस्पात की तिजोरी और अलमारियां ।
23. मोटर स्पिरिट, हाई स्पीड डीजल तेल, वैमानिक गैसोलीन, विमान टरबाइन ईंधन और मोटरयानों और वायुयानों के लिए अन्य सभी प्रकार के ईंधन ।
24. प्रसाधन सामग्री, सुगन्धित सामग्री, और श्रृंगार सामग्री जिनके अन्तर्गत शैम्पू भी हैं किन्तु उनके अन्तर्गत साबुन, दन्तब्रुश, टूथपेस्ट, दन्त मंजन और कुमकुम नहीं हैं ।
25. जूते, पेटियां और चमड़े से बनी खेलकूद की वस्तुओं के सिवाय चमड़े की वस्तुएं ।
26. फर्नीचर जिसके अन्तर्गत लोहे और इस्पात के फर्नीचर भी हैं ।
27.चादर, गद्दे, तकिए, चटाइयां और फोम रबर या प्लास्टिक फोम या अन्य संशिलष्ट फोम से बनी अन्य वस्तुएं ।
28. फर और उनसे बनी शारीरिक या घरेलू प्रयोग की वस्तुएं ।
29. स्टेनलैस स्टील से बनी वस्तुएं और बर्तन किन्तु उनके अन्तर्गत सेफ्टी रेजर ब्लेड और शल्य उपकरण या औद्योगिक मशीनरी और संयंत्र के पुर्जे नहीं हैं ।
30. परैम्बुलेटर ।
31. प्लास्टिक, सेलूलाइड बेकेलाइट की वस्तुएं और इसी प्रकार के अन्य पदार्थों से बनी वस्तुएं किन्तु उनके अन्तर्गत तीस रुपए प्रति टुकड़े के मूल्य से अनधिक की वस्तुएं नहीं हैं ।
32. आतिशबाजी जिनके अन्तर्गत रंगीन दियासलाई भी हैं ।
33. लिफ्ट चाहे वे विद्युत या द्रवचालित शक्ति द्वारा चलाई जाती हों ।
34. सभी प्रकार की चमकदार और विटरम टाइलें, मोजेक टाइलें, स्तरित चादरें जैसे सन माइका, फारमाइका, आदि ।
द्वितीय अनुसूची
[धारा 4(1) (ख) देखिए]
1. कोयला, जिसके अन्तर्गत सभी प्रकार का कोक है ।
2. केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 14 में यथापरिभाषित कपास ।
3. केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 14 में यथापरिभाषित लोहा और इस्पात ।
4. केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 14 में यथापरिभाषित पटसन ।
5. केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 14 में यथापरिभाषित तिलहन ।
6. पशु चर्म और खालें, चाहे कच्ची हों या साफ की हुई ।
7. सूती धागे जो केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 14 में परिभाषित है और सूती डोरे ।
तृतीय अनुसूची
(धारा 7 देखिए)
1. सभी अनाज और दालें जिनके अन्तर्गत सभी प्रकार के चावल और उनकी भूसी और पकाई हुई दालें भी हैं ।
2. आटा जिसके अन्तर्गत आटा, मैदा, बेसन और सूजी भी हैं ।
3. चपातियां, पराठें, भरे हुए पराठें, पूड़ियां, भरी हुई पूड़ियां, कुलचे, नान और भटूरे और ब्रैड (डबल रोटी) ।
4. मांस और मछली, जो डिब्बाबन्द, परिरक्षित, प्रसंस्कृत, जुखाई गई, निर्जलित या पकाई हुई न हों ।
5. ताजे अंडे ।
6. हरी या सूखी सब्जियां (तब के सिवाय जब उनका मुहरबन्द पात्रों में विक्रय किया जाए) और सब्जियों के बीज ।
7. सूखे फलों या डिब्बाबन्द, परिरक्षित, सुखाए गए या निर्जलित फलों से भिन्न फल ।
8. केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 (1944 का 1) में यथापरिभाषित चीनी ।
9. नमक ।
10. ताजा दूध (पूर्ण या सप्रेटा), जिसके अन्तर्गत, उबाला हुआ और चीनी मिलाया हुआ दूध भी है ।
11. देशी कोल्हू या घानी द्वारा उत्पादित खाद्य तेल (जिसमें किसी प्रक्रम पर विद्युत् या किसी अन्य शक्ति का प्रयोग नहीं किया जाता है), जब ऐसे तेल का उस व्यक्ति द्वारा विक्रय किया जाए जिसके स्वामित्व में ऐसा देशी कोल्हू या घानी है और जो खाद्य तेल का ऐसे देशी कोल्हू और घानी की सहायता से अनन्यतः उत्पादन करता है ।
12. दही और लस्सी ।
13. सभी प्रकार के सूती तन्तुकृत, रेयन या कृत्रिम या रेशमी तन्तुकृत और ऊनी तन्तुकृत ।
स्पष्टीकरण-सूती तन्तुकृत", रेयन या कृत्रिम रेशमी तन्तुकृत" और ऊनी तन्तुकृत" पदों के वही अर्थ होंगे जो उनके केन्द्रीय उत्पादशुल्क और नमक अधिनियम, 1944 (1944 का 1) में हैं ।
14. पुस्तकें और आवधिक पत्रिकाएं, नक्शे, शैक्षिक चार्ट, छात्रों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले उपकरण, बक्से और छात्रों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले शैक्षिक ग्लोब और उपकरण जैसे यांत्रिक ड्राइंग और जीवविज्ञान में प्रयोग किए जाने वाले उपकरण ।
15. ईंधन लकड़ी और चारकोल ।
16. स्कूल की अभ्यास और ड्राइंग पुस्तकें ।
17. कृषि उपकरण जिनके अन्तर्गत कुट्टी की मशीन और रहट या उनके पुर्जे भी हैं और विद्युत् मोटर जिनके अन्तर्गत 3 से 7ड़ अश्वशक्ति में मोनाब्लाक पम्प सेट भी हैं ।
18. चारा-दाना जिनके अन्तर्गत चारा और कुक्कुट फीड भी हैं ।
19. विद्युत् ऊर्जा ।
20. उर्वरक ।
21. जल किन्तु वातित जल या खनिज जल अथवा बोतलों या मुहरबन्द पात्रों में विक्रय किया जाने वाला जल नहीं ।
22. केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 (1944 का 1) के अधीन यथापरिभाषित तम्बाकू ।
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23. (i) देशी जूते (जूतियां) । (ii) बेंत और बांस की बनी हस्तशिल्प । |
जब उनका निर्माण- (क) शक्ति का प्रयोग किए बिना किया जाए, और |
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(iii) कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के बर्तन । |
(ख) कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) में यथापरिभाषित कारखाने से भिन्न किसी स्थान पर किया जाए और उनका विक्रय या तो स्वयं बनाने वाले द्वारा या उसके कुटुम्ब के किसी व्यक्ति द्वारा या ऐसी सहकारी सोसाइटी द्वारा किया जाए जिसमें पूर्णतया ऐसी वस्तुओं के बनाने वाले हों । |
24. चर्खा, तकली और चर्खा उपसाधन ।
25. स्लेट, स्लेट पेंसिल, तख्तियां, तख्तियों के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली काली स्याही, लिखने का चाक, वर्तिकाएं (जिसके अन्तर्गत रंगीन पेंसिल नहीं है), स्कूलों में प्रयोग में आने वाले फुटरूल और कलम (तख्तियों के लिए प्रयोग में आने वाले कलम) ।
26. पान के पत्ते जिनके अन्तर्गत लगे हुए पान भी हैं ।
27. पादप संरक्षण के लिए पीड़कनाशी ।
28. पादप संरक्षण मशीनें ।
29. खद्दर (नाम संरक्षण) अधिनियम, 1950 (1950 का 78) के अधीन प्रमाणित किए गए कपड़ों से बनाए गए खादी के सिले-सिलाए वस्त्र ।
30. कन्डोम ।
31. संचरण के लिए रक्त अर्थात् ताजा मानव रक्म या प्लाजमा, द्रव या सूखा ।
32. हाथ का कता हुआ सूत ।
33. अचार और मुरब्बा तब के सिवाय जब उनका मुहरबन्द पात्रों में विक्रय किया जाए ।
34. वैज्ञानिक वस्तुएं जिनके अन्तर्गत वैज्ञानिक शीशे की वस्तुएं, जयामितीय और ड्राइंग की वस्तुएं भी हैं जिनका प्रयोग विद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षण के लिए और छात्रों द्वारा प्रयोग किए जाने के लिए किया जाता है ।
35. पशुधन जिसके अन्तर्गत कुक्कुट पालन भी है ।
36. रुई की गद्दी ।
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